मनीष और उसकी पत्नी कविता की शादी को आठ साल हो चुके थे। दोनों का एक बेटा भी था। परिवार में किसी तरह की बड़ी परेशानी दिखाई नहीं देती थी, लेकिन पिछले कुछ महीनों से मनीष को अपनी पत्नी के व्यवहार में बदलाव महसूस हो रहा था। कविता अक्सर अपना फोन लॉक करके रखती और रात में देर तक किसी से मैसेज करती रहती। मनीष पूछता तो वह कह देती कि किसी रिश्तेदार से बात कर रही है।
एक रात मनीष की अचानक नींद खुली तो उसने देखा कि कविता कमरे में नहीं थी। बाहर जाकर देखा तो वह स्टोररूम में कुछ सामान रख रही थी। उसके पास एक बड़ा बैग था। मनीष ने पूछा कि इतनी रात को क्या कर रही हो, लेकिन कविता ने घबराकर कहा कि पुराने कपड़े निकाल रही थी। मनीष को उसकी बात अजीब लगी।
अगली रात उसने फिर देखा कि कविता अपना बैग तैयार कर रही है। इस बार बैग में कपड़ों के साथ कुछ जरूरी कागज और गहनों का एक छोटा डिब्बा भी रखा था। मनीष के मन में शक और गहरा गया। उसे लगा कि शायद कविता किसी दूसरे आदमी के साथ घर छोड़ने की तैयारी कर रही है।
मनीष ने कुछ नहीं कहा। उसने तय किया कि पहले पता लगाएगा कि कविता आखिर करने क्या वाली है।
दो दिन बाद रात करीब साढ़े दस बजे कविता ने घर से निकलते समय किसी को फोन किया। उसने कहा, "आज सब तैयार है। बस तुम समय पर आ जाना।"
मनीष ने यह बात सुन ली।
कविता घर से निकली तो मनीष भी कुछ दूरी बनाकर उसके पीछे चल पड़ा। कविता शहर के पुराने बस अड्डे के पास पहुंची। वहां एक युवक पहले से खड़ा था। उसने कविता का बैग लिया और दोनों कुछ देर तक आपस में बात करने लगे।
मनीष का शक अब लगभग यकीन में बदल गया।
लेकिन तभी उस युवक ने कविता से कहा, "तुम्हें यकीन है कि ये कागज सही हैं?"
कविता ने जवाब दिया, "अगर ये गलत निकले तो हम सब फंस जाएंगे।"
मनीष यह सुनकर रुक गया।
उसे समझ नहीं आया कि दोनों कागजों की बात क्यों कर रहे हैं।
वह अचानक उनके सामने पहुंच गया।
कविता उसे देखकर घबरा गई।
मनीष ने गुस्से में पूछा, "कौन है ये?"
युवक ने अपना नाम आकाश बताया।
मनीष ने कविता से कहा, "मुझे लगा था तुम मेरे साथ धोखा कर रही हो।"
कविता की आंखों में आंसू आ गए।
उसने कहा, "मैं तुम्हें धोखा नहीं दे रही थी। मैं तुम्हें बचाने की कोशिश कर रही थी।"
मनीष को उसकी बात समझ नहीं आई।
कविता ने बताया कि कुछ महीने पहले उसे अपने पति के पुराने कागजों में एक बैंक खाते से जुड़े दस्तावेज मिले थे। उस खाते में कई साल पहले बड़ी रकम जमा और ट्रांसफर हुई थी। कविता ने जब इसकी जांच शुरू की तो उसे पता चला कि उस समय मनीष के नाम से भी कुछ दस्तावेज इस्तेमाल किए गए थे।
मनीष ने कहा, "मेरे नाम से?"
कविता ने सिर हिलाया।
आकाश ने बताया कि वह एक अकाउंटिंग कंपनी में काम करता था और पुराने वित्तीय रिकॉर्ड की जांच के दौरान उसे भी वही लेनदेन मिले थे। कविता ने उसी के जरिए इस मामले को समझने की कोशिश शुरू की थी।
मनीष ने पूछा, "लेकिन तुम घर छोड़कर कहां जाने वाली थीं?"
कविता ने कहा कि वह घर छोड़कर भागने नहीं जा रही थी। वह कुछ दिनों के लिए अपनी बहन के घर जाने वाली थी क्योंकि उसे डर था कि अगर किसी को पता चल गया कि वह पुराने दस्तावेजों की जांच कर रही है तो उसे और उसके बेटे को परेशानी हो सकती है।
मनीष ने बैग की तरफ देखा। उसमें कपड़ों के अलावा वही फाइल रखी थी जिसके बारे में कविता कई दिनों से उससे बात छिपा रही थी।
मनीष ने पूछा, "तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?"
कविता ने कहा, "क्योंकि मुझे डर था कि तुम सीधे उस व्यक्ति के पास पहुंच जाओगे जिसका नाम इन कागजों में है।"
मनीष ने पूछा, "किसका नाम है?"
कविता ने फाइल खोली और एक कागज उसके सामने रख दिया।
कागज पर नाम देखकर मनीष कुछ देर तक कुछ नहीं बोल सका।
वह नाम उसके पुराने कारोबारी साझेदार विनोद का था।
विनोद कभी मनीष के परिवार का करीबी माना जाता था। उसके साथ मिलकर मनीष के पिता ने कई साल तक कारोबार किया था। कारोबार बंद होने के बाद भी दोनों परिवारों के बीच संबंध बने रहे थे।
आकाश ने बताया कि कुछ पुराने बैंक लेनदेन में विनोद से जुड़े खातों का नाम सामने आया था। हालांकि अभी यह साबित नहीं हुआ था कि उन लेनदेन के पीछे वही था।
कविता ने कहा कि उसे सबसे ज्यादा डर इस बात का था कि अगर दस्तावेज गलत हाथों में चले गए तो सारे सबूत खत्म हो सकते हैं।
मनीष ने उसी समय फैसला किया कि वह मामले को पुलिस के पास ले जाएगा।
पुलिस ने दस्तावेज और बैंक रिकॉर्ड अपने कब्जे में ले लिए। शुरुआती जांच में कुछ लेनदेन संदिग्ध पाए गए। पुराने कारोबारी रिकॉर्ड भी खंगाले गए।
विनोद से पूछताछ की गई तो उसने किसी भी गड़बड़ी से इनकार किया। उसने कहा कि पुराने खातों में हुए लेनदेन के बारे में उसे पूरी जानकारी नहीं थी।
जांच के दौरान एक और दस्तावेज सामने आया। उसमें मनीष के पिता ने कई साल पहले अपने कारोबार में पैसों की कमी को लेकर कुछ सवाल लिखे थे।
सबसे नीचे एक लाइन थी—
"अगर यह हिसाब कभी खुले तो सबसे पहले उस व्यक्ति को देखना जो नुकसान के बाद भी सबसे ज्यादा फायदा उठा रहा है।"
मनीष ने वह लाइन पढ़ी तो उसे अपने पिता की आखिरी दिनों की बातें याद आने लगीं।
मामला अब सिर्फ पत्नी के कथित अफेयर का नहीं था। पुराने कारोबार और संदिग्ध लेनदेन की जांच भी शुरू हो चुकी थी।
मनीष ने कविता से कहा, "मैंने तुम्हें गलत समझा।"
कविता ने कहा, "गलती मेरी भी थी। मुझे तुम्हें सब पहले बता देना चाहिए था।"
लेकिन कहानी का आखिरी सवाल अभी बाकी था।
अगर कविता सच में मनीष को छोड़कर जाने वाली नहीं थी, तो उसने इतनी रात को बैग क्यों तैयार किया था? और सबसे बड़ा सवाल यह था कि मनीष के पिता ने वर्षों पहले जिस व्यक्ति पर शक करने का संकेत दिया था, क्या वही पुराने वित्तीय मामले के पीछे था?
पुलिस की जांच जारी रही और पुराने दस्तावेजों की एक-एक कड़ी जोड़ी जाने लगी।
मनीष के लिए उस रात सबसे बड़ा झटका यह था कि जिस बैग को वह अपनी पत्नी के किसी दूसरे आदमी के साथ भागने की तैयारी समझ रहा था, उसी बैग में उसके परिवार के वर्षों पुराने रहस्य से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज रखे थे।
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