एक बार की बात है। एक फकीर था, बिल्कुल मस्त-मौला। न उसे धन-दौलत का लालच था और न ही आने वाले कल की कोई चिंता।
किसी ने कुछ दे दिया तो खा लिया, नहीं दिया तो मुस्कुराकर कहता—
“रामजी की जय!”
लेकिन उस फकीर की एक बात पूरे इलाके में मशहूर थी।
कहा जाता था कि उसकी जुबान से निकली बात कभी खाली नहीं जाती। वह किसी के बारे में कुछ कह देता तो कुछ समय बाद वही बात सच हो जाती।
एक दिन फकीर अपनी देह पर चादर लपेटे हुए महल के पास से गुजर रहा था। उसी समय राजा की रानी अपनी पालकी में बैठकर कहीं जा रही थीं।
रानी की एक दासी की नजर फकीर पर पड़ी।
उसने धीरे से रानी से कहा—
“महारानी, यही वह फकीर है जिसकी वाणी में बड़ा प्रभाव बताया जाता है। कहते हैं, जिसके बारे में जो बोल दे, वैसा ही हो जाता है।”
रानी की उत्सुकता बढ़ गई।
उन्होंने पालकी रुकवाई और अपनी थैली से चार अशर्फियां निकालकर फकीर को दे दीं।
फकीर ने अशर्फियों को देखा, उन्हें अपनी जेब में रखा और बिना कुछ बोले आगे बढ़ने लगा।
रानी को लगा कि शायद फकीर ने उन्हें पहचानकर भी कोई दुआ नहीं दी।
उन्होंने पीछे से आवाज लगाई—
“बाबा… कुछ दुआ तो देते जाओ!”
फकीर रुका।
धीरे से पलटा और रानी की तरफ देखा।
फिर बिल्कुल सहज अंदाज में बोला—
“इतने बड़े राज्य की रानी हो, पालकी में बैठी हो… और क्या बांस पर चढ़ोगी?”
रानी कुछ पल के लिए बिल्कुल स्तब्ध रह गईं।
उन्हें समझ ही नहीं आया कि फकीर ने उन्हें आशीर्वाद दिया है या उनका मजाक उड़ाया है।
फकीर ने अपनी चादर संभाली और आगे बढ़ गया।
जाते-जाते उसके मुंह से वही शब्द निकले—
“रामजी की जय!”
रानी काफी देर तक फकीर को जाते हुए देखती रहीं।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असली सवाल तो यही था कि फकीर ने रानी से “बांस पर चढ़ने” की बात आखिर क्यों कही?
क्या वह सिर्फ मजाक था?
या उसकी जुबान से अनजाने में भविष्य की कोई बात निकल गई थी?
यही वह रहस्य था जिसने रानी के मन में उस दिन से एक अजीब-सी बेचैनी पैदा कर दी।
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