मनीष अपनी पत्नी कविता के साथ रहता था। शादी को सात साल हो चुके थे। दोनों की जिंदगी सामान्य चल रही थी, लेकिन पिछले कुछ महीनों से कविता के व्यवहार में अचानक बदलाव आने लगा था।
वह लगभग हर दूसरे दिन शाम को घर से निकलती।
कभी कहती—
"मंदिर जा रही हूं।"
कभी—
"सहेली के घर जाना है।"
और कभी कहती कि पड़ोस की एक महिला को डॉक्टर के पास ले जाना है।
मनीष ने कभी ज्यादा सवाल नहीं किए।
लेकिन एक बात उसे लगातार परेशान कर रही थी।
हर बार कविता अकेली जाती थी और करीब दो घंटे बाद ही लौटती थी।
एक दिन कविता का फोन घर पर ही रह गया
शाम को कविता जल्दी में घर से निकली और अपना फोन मेज पर भूल गई।
कुछ मिनट बाद फोन पर एक संदेश आया।
मनीष ने स्क्रीन पर सिर्फ एक लाइन देखी—
"आज पुरानी जगह पर जरूर आना। देर मत करना।"
नंबर सेव नहीं था।
मनीष के मन में पहला ख्याल आया—
कहीं कविता का कोई प्रेमी तो नहीं?
उसने तुरंत उसे फोन नहीं किया।
उसने तय किया कि आज वह उसका पीछा करेगा।
कविता एक पुराने मकान तक पहुंची
करीब आधे घंटे बाद कविता एक ऑटो से शहर के पुराने हिस्से में पहुंची।
वह एक जर्जर मकान के सामने उतरी।
मनीष ने कुछ दूरी पर अपनी बाइक रोक दी।
कविता अंदर चली गई।
कुछ मिनट बाद एक युवक वहां पहुंचा।
मनीष का शक और गहरा गया।
युवक करीब 30 साल का था।
वह सीधे उसी मकान में चला गया।
मनीष कुछ देर बाहर खड़ा रहा।
फिर उसने अंदर जाने का फैसला किया।
कमरे के अंदर जो देखा, उससे वह हैरान रह गया
मनीष ने दरवाजा थोड़ा खुला पाया।
अंदर कविता उस युवक के सामने बैठी थी।
मनीष को लगा कि अब उसका शक सही साबित हो गया।
लेकिन तभी उसने युवक को कहते सुना—
"अगर यह कागज आज नहीं मिले तो सब खत्म हो जाएगा।"
कविता ने जवाब दिया—
"मैंने जितना हो सकता था, कर दिया है।"
मनीष कुछ समझ नहीं पाया।
अगर दोनों का प्रेम संबंध था तो वे कागजों की बात क्यों कर रहे थे?
तभी कविता ने एक पुराना लिफाफा निकाला
उसने लिफाफा युवक को दिया।
युवक ने उसे खोलकर देखा।
अंदर कुछ पुराने दस्तावेज और तस्वीरें थीं।
एक तस्वीर देखते ही मनीष के होश उड़ गए।
उसमें उसके पिता दिखाई दे रहे थे।
लेकिन उनके साथ वही युवक खड़ा था।
मनीष ने दरवाजा खोल दिया
दोनों अचानक घबरा गए।
मनीष ने गुस्से में पूछा—
"यह सब क्या चल रहा है?"
कविता की आंखों में आंसू आ गए।
उसने कहा—
"मैं तुम्हें सब बताने वाली थी।"
मनीष ने युवक की तरफ देखा।
"तुम कौन हो?"
युवक ने कहा—
"मेरा नाम निखिल है। मैं आपके पिता के पुराने कारोबार में काम करता था।"
मनीष और ज्यादा हैरान हो गया।
उसके पिता की मृत्यु चार साल पहले हो चुकी थी।
चार साल पुराना मामला फिर सामने आया
निखिल ने बताया कि मनीष के पिता की मौत से कुछ महीने पहले उनके कारोबार में बड़ी रकम का हिसाब गायब हुआ था।
उन्होंने इस मामले की जांच शुरू की थी।
लेकिन अचानक उनकी तबीयत खराब हुई और उनकी मृत्यु हो गई।
मामला कभी साफ नहीं हुआ।
निखिल के पास कुछ पुराने दस्तावेज थे।
कविता को कुछ महीने पहले इन दस्तावेजों के बारे में पता चला।
तभी से वह निखिल के साथ मिलकर सच्चाई खोज रही थी।
लेकिन मनीष को सबसे ज्यादा दुख किस बात का था?
उसने कविता से पूछा—
"तुमने मुझे क्यों नहीं बताया?"
कविता ने कहा—
"क्योंकि मुझे डर था कि तुम्हें पता चला तो तुम सीधे उन लोगों से भिड़ जाओगे जिनके खिलाफ ये सबूत हैं।"
मनीष ने पूछा—
"और तुम हर बार घर से झूठ बोलकर क्यों निकलती थीं?"
कविता ने कहा—
"क्योंकि हमें पता नहीं था कि हमारे फोन भी देखे जा रहे हैं।"
तभी बाहर एक कार आकर रुकी
तीनों की बातचीत अचानक रुक गई।
खिड़की से बाहर एक काली कार दिखाई दी।
निखिल ने धीमी आवाज में कहा—
"ये लोग यहां तक पहुंच गए।"
मनीष ने पूछा—
"कौन लोग?"
निखिल ने जवाब नहीं दिया।
अगले ही पल दरवाजे पर जोर से दस्तक हुई।
पुलिस भी वहां पहुंच गई
दरवाजा खुला तो बाहर पुलिस थी।
मनीष चौंक गया।
पुलिस अधिकारी ने कहा—
"हमें इस मकान की जानकारी पहले से मिली थी।"
पुलिस ने अंदर मौजूद दस्तावेज जब्त कर लिए।
अब मनीष को समझ आया कि मामला उसकी पत्नी के किसी प्रेम संबंध से कहीं बड़ा था।
दस्तावेजों में छिपा था बड़ा वित्तीय घोटाला
जांच में पता चला कि मनीष के पिता के कारोबार से करोड़ों रुपये की हेराफेरी की गई थी।
कई फर्जी खाते बनाए गए थे।
कुछ संपत्ति भी दूसरे लोगों के नाम करने की कोशिश हुई थी।
निखिल इस पूरे मामले का गवाह था।
उसने डर के कारण वर्षों तक चुप्पी साधे रखी।
कविता ने पुराने कागज खोजे तो उसने निखिल से संपर्क किया।
दोनों मिलकर सबूत जुटाने लगे।
लेकिन कविता पर भी शक हुआ
पुलिस ने कविता से पूछा—
"आपने इतने महीनों तक अपने पति से यह बात क्यों छिपाई?"
कविता ने कहा—
"क्योंकि मुझे डर था कि परिवार में ही कोई व्यक्ति इस मामले में शामिल है।"
उसके पास इसके कुछ सबूत भी थे।
जांच में पता चला कि मनीष के एक रिश्तेदार का नाम पुराने बैंक लेनदेन में सामने आया था।
असली अपराधी परिवार के करीब था
पुलिस ने पुराने बैंक रिकॉर्ड और संपत्ति के कागजों की जांच की।
धीरे-धीरे पता चला कि मनीष के पिता के कारोबार से जुड़े कई फर्जी लेनदेन एक करीबी रिश्तेदार के जरिए हुए थे।
उस व्यक्ति ने वर्षों पहले कारोबार की कुछ संपत्तियों पर कब्जा करने की कोशिश की थी।
मनीष के पिता को इसकी जानकारी हो गई थी।
लेकिन उनकी मृत्यु के बाद मामला दब गया।
कविता का शक सही निकला
कविता को इसी वजह से डर था।
वह नहीं चाहती थी कि मनीष सीधे उस व्यक्ति से भिड़ जाए।
इसलिए उसने निखिल की मदद से पहले सबूत जुटाए।
मनीष को लगा था कि उसकी पत्नी का कोई प्रेमी है।
लेकिन जिस युवक को उसने आधी रात पुराने मकान में कविता के साथ देखा था...
वह उसके पिता के पुराने कारोबार का गवाह निकला।
आखिरी सच
पुलिस ने दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिए।
पुराने वित्तीय मामले की जांच फिर शुरू हुई।
कई लोगों से पूछताछ हुई।
मनीष ने अपनी पत्नी से कहा—
"तुमने मुझसे सच छिपाया, इसलिए मुझे तुम पर शक हुआ।"
कविता ने जवाब दिया—
"मैंने गलत किया। लेकिन मेरा इरादा तुम्हें धोखा देना नहीं था।"
मनीष कुछ देर चुप रहा।
फिर उसने कहा—
"अगर तुमने शुरुआत में सच बता दिया होता तो शायद मैं तुम्हारे पीछे कभी नहीं आता।"
अंत
मनीष को लगा था कि उसकी पत्नी रोज किसी प्रेमी से मिलने घर से निकलती है।
उसने उसका पीछा किया तो एक पुराने मकान में उसे एक अनजान युवक के साथ देखकर उसका शक और गहरा गया।
लेकिन कमरे में मिले दस्तावेजों ने पूरी कहानी पलट दी।
वह युवक प्रेमी नहीं, बल्कि मनीष के पिता के पुराने कारोबार का गवाह था।
और कविता महीनों से अपने पति से छिपकर कोई प्रेम संबंध नहीं...
बल्कि चार साल पुराने वित्तीय अपराध का सच खोज रही थी।
मगर एक बात ने रिश्ते में दरार जरूर डाल दी—
कविता ने सच छिपाया और मनीष ने शक किया।
दोनों की नीयत अलग थी, लेकिन एक ही झूठ ने उनके रिश्ते को अपराध की कहानी जैसा बना दिया।
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