एक सिक्का, एक लाख स्वर्ण मुद्राएं और खजांची की ऐसी चाल कि पूरा दरबार दंग रह गया


एक राजा के राज्य में एक खजांची हुआ करता था। वह बेहद ईमानदार और अपने काम के प्रति समर्पित था। राजकोष की सुरक्षा उसके लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी। यहां तक कि अगर राजा की कोई ऐसी बात होती जो राजकोष के नियमों के खिलाफ होती, तो वह उसे मानने से भी इनकार कर देता था।

उसकी इसी ईमानदारी के कारण उसके कई विरोधी भी थे। लोग राजा के पास उसकी शिकायतें लेकर पहुंचते और उसे पद से हटाने की कोशिश करते, लेकिन राजा अपने खजांची की नीयत और काबिलियत अच्छी तरह जानता था।

राजा को भरोसा था कि उसका खजांची अपने परिवार से भी ज्यादा राजकोष की रक्षा करता है।

लेकिन खजांची के पद पर किसी और की नजर थी।

राजा की रानी चाहती थी कि उसका भाई इस पद पर नियुक्त हो। उसने राजा से कहा,

“आपका वर्तमान खजांची उतना योग्य नहीं है जितना आप समझते हैं। मेरा भाई पढ़ा-लिखा है और खजाने की अच्छी देखभाल कर सकता है।”

राजा ने जवाब दिया,

“राजकोष राज्य की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक है। यहां किसी की सिफारिश नहीं, बल्कि योग्यता देखी जाएगी। अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारा भाई ज्यादा योग्य है, तो दोनों की परीक्षा ले लेते हैं।”

अगले दिन राजा ने रानी के भाई को बुलाया और उसके हाथ में एक स्वर्ण मुद्रा रखते हुए कहा,

“शाम तक मुझे इसकी एक लाख स्वर्ण मुद्राएं चाहिए।”

रानी का भाई मुद्रा लेकर चला गया। वह काफी देर तक सोचता रहा कि आखिर एक स्वर्ण मुद्रा से एक लाख स्वर्ण मुद्राएं कैसे बनाई जा सकती हैं।

शाम को वह दरबार में लौटा और वही स्वर्ण मुद्रा राजा के सामने रखते हुए बोला,

“महाराज, मैं यह काम नहीं कर सका।”

अब राजा ने वही परीक्षा अपने पुराने खजांची को देने का फैसला किया।

राजा ने उसे भी एक स्वर्ण मुद्रा दी और कहा,

“शाम तक इसकी एक लाख स्वर्ण मुद्राएं लेकर आओ।”

खजांची मुद्रा लेकर बाजार पहुंचा। लेकिन उसने सिर्फ मुद्रा को बेचने या उससे व्यापार करने के बजाय अपनी बुद्धि का इस्तेमाल किया।

उसने बाजार से एक लंबी रस्सी खरीदी और शहर के सबसे बड़े सेठ की हवेली पर पहुंच गया।

वह हवेली को चारों तरफ से रस्सी से नापने लगा।

कुछ देर बाद सेठ बाहर आया और घबराकर पूछने लगा,

“खजांची जी, आप मेरी हवेली क्यों नाप रहे हैं? मुझसे कोई गलती हो गई क्या?”

खजांची ने गंभीरता से कहा,

“गलती की बात नहीं है। राजा ने पूरे नगर में लोगों को बराबर क्षेत्रफल में जमीन दी है, लेकिन आपकी हवेली निर्धारित सीमा से काफी बड़ी दिखाई दे रही है। राजा इस बात से बहुत नाराज हैं।”

सेठ यह सुनकर घबरा गया।

उसे डर था कि कहीं राजा उसकी हवेली को तुड़वा न दें।

उसने खजांची से कहा,

“आप ही कोई रास्ता बताइए। मैं राजकोष में योगदान देने के लिए तैयार हूं।”

खजांची ने कहा,

“अगर आप सच में मामला सुलझाना चाहते हैं तो राजकोष में एक लाख स्वर्ण मुद्राओं का योगदान करना होगा।”

सेठ बहुत बड़ा व्यापारी था। उसके लिए एक लाख स्वर्ण मुद्राएं कोई बड़ी रकम नहीं थी। उसने तुरंत अपने कर्मचारियों को बुलाया और एक लाख स्वर्ण मुद्राएं गिनकर खजांची को दे दीं।

खजांची उन मुद्राओं को लेकर सीधे राजदरबार पहुंच गया।

राजा ने पूछा,

“क्या तुम एक लाख स्वर्ण मुद्राएं लेकर आए?”

खजांची ने कहा,

“जी महाराज।”

राजा ने जब पूरी बात सुनी तो वह बेहद प्रसन्न हुआ।

फिर उसने रानी की ओर देखकर कहा,

“खजांची केवल किताबों से नहीं बनता। इसके लिए ईमानदारी के साथ अनुभव, परिस्थिति को समझने की क्षमता और सही समय पर सही निर्णय लेने की बुद्धि भी चाहिए।”

रानी के भाई ने भी अपनी गलती समझ ली।

रानी ने मुस्कुराते हुए अपने भाई से कहा,

“भैया, पढ़ाई तो आपने भी बहुत की थी, लेकिन खजांची बनने के लिए किताबों से ज्यादा अक्ल चाहिए।”

सीख

किसी व्यक्ति को केवल उसके दिखाई देने वाले काम से नहीं आंकना चाहिए। कई बार कोई व्यक्ति बाहर से साधारण दिखाई देता है, लेकिन उसके अनुभव, निर्णय लेने की क्षमता और परिस्थितियों को समझने की कला उसे दूसरों से कहीं ज्यादा मूल्यवान बना देती है।

डिग्री ज्ञान दे सकती है, लेकिन सही समय पर सही निर्णय लेने की बुद्धि अनुभव से आती है।

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