
इंदौर में रहने वाला एक युवक एक बड़ी कंपनी में नौकरी करता था। अच्छी नौकरी, ठीक-ठाक सैलरी और शहर में अच्छा रहन-सहन होने की वजह से उसके अंदर धीरे-धीरे एक गलत धारणा बन गई थी।
उसे लगता था कि किसी व्यक्ति की हैसियत उसके कपड़ों, काम और दुकान के आकार से आसानी से पहचानी जा सकती है।
एक दिन उसकी बहन की शादी थी। घर की महिलाओं के लिए कई कपड़े सिलवाने थे। युवक कपड़े लेकर शहर के एक छोटे-से बुटीक में पहुंचा।
काउंटर पर करीब 40 साल की एक महिला बैठी थीं।
युवक ने कपड़े सामने रखते हुए पूछा,
“ये सब सिलने हैं। कितना लगेगा?”
महिला ने कपड़ों को ध्यान से देखा और कहा,
“लगभग 18 हजार रुपये।”
इतना सुनते ही युवक के चेहरे के भाव बदल गए।
उसने कहा,
“18 हजार? इतना तो बहुत ज्यादा है। आखिर सिलाई ही तो करनी है!”
महिला ने बिना बहस किए शांत स्वर में कहा,
“आप चाहें तो दूसरे बुटीक में भी रेट पूछ सकते हैं।”
युवक ने आसपास के तीन और बुटीक में फोन करके कीमत पूछी।
हैरानी की बात यह थी कि लगभग सभी जगह रेट करीब-करीब उतना ही था।
आखिरकार युवक ने उसी महिला को कपड़े सिलने का काम दे दिया।
तीन दिन बाद वह कपड़े लेने वापस आया।
दुकान के सामने से देखने पर उसे वहां सिर्फ चार-पांच महिलाएं ही काम करती दिखाई दीं।
उसने मन ही मन सोचा,
“छोटी-सी दुकान है… ज्यादा बड़ा काम नहीं होगा।”
वह कपड़े लेकर जाने ही वाला था कि महिला ने उससे कहा,
“अगर आपको जल्दी नहीं है तो पीछे का हिस्सा भी देख लीजिए।”
युवक उनके साथ अंदर चला गया।
और वहां पहुंचते ही उसकी नजरें ठहर गईं।
पीछे के हिस्से में चार-पांच नहीं, बल्कि करीब 25 महिलाएं काम कर रही थीं।
कहीं कपड़ों की कटिंग हो रही थी।
कहीं सिलाई मशीनें चल रही थीं।
कहीं कढ़ाई का काम चल रहा था।
और कुछ महिलाएं तैयार कपड़ों की पैकिंग कर रही थीं।
युवक ने हैरानी से पूछा,
“इतनी सारी महिलाएं यहां काम करती हैं?”
महिला मुस्कुराईं और बोलीं,
“ये सिर्फ मेरा बुटीक नहीं है बेटा… ये 63 महिलाओं के काम का जरिया है।”
युवक कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप हो गया।
महिला ने बताया कि उनके तैयार कपड़े इंदौर के अलावा भोपाल, उज्जैन, नागपुर और पुणे तक भेजे जाते हैं।
युवक की उत्सुकता बढ़ गई।
उसने पूछा,
“आपने ये सब कब शुरू किया?”
महिला ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,
“करीब दस साल पहले मेरे पास अपनी सिलाई मशीन तक नहीं थी।”
फिर उन्होंने बताया कि जब उन्होंने सिलाई का काम शुरू किया था, तब कई लोग उन्हें सलाह देते थे कि घर संभालो और सिलाई जैसे काम से आखिर कितना आगे बढ़ोगी।
लेकिन उन्होंने लोगों की बातों पर ध्यान देने के बजाय अपने काम पर ध्यान दिया।
उन्होंने कहा,
“घर भी संभाला और सिलाई को कारोबार भी बना दिया।”
युवक ने फिर पूछा,
“आज आपका कारोबार कितना है?”
महिला ने किसी बड़े आंकड़े का दावा नहीं किया।
उन्होंने बस इतना कहा,
“इतना है कि मेरे साथ काम करने वाली 63 महिलाओं में से कई अपने बच्चों की फीस खुद भरती हैं और कई परिवारों में उनकी कमाई सबसे बड़ी कमाई है।”
युवक के पास अब कहने के लिए कुछ नहीं था।
जिस दुकान को वह कुछ देर पहले छोटा समझ रहा था, उसके अंदर दर्जनों महिलाओं के रोजगार और उनके परिवारों की उम्मीदें जुड़ी हुई थीं।
कुछ देर बाद युवक ने महिला से कहा,
“मैं आपको सिर्फ कपड़े सिलने वाली महिला समझ रहा था।”
महिला मुस्कुराईं और बोलीं,
“यही तो समस्या है बेटा… लोग महिला के हाथ में सुई देखते हैं, उसके हाथ में अपना भविष्य बनाने की ताकत नहीं देखते।”
यह बात युवक के मन में बैठ गई।
उस दिन उसे समझ आया कि किसी व्यक्ति की कीमत उसके काम को देखकर तय नहीं की जा सकती।
दुकान छोटी हो सकती है, काम साधारण दिखाई दे सकता है और शुरुआत बेहद मामूली हो सकती है।
लेकिन उसके पीछे छिपी मेहनत, जिम्मेदारी, अनुभव और लोगों के जीवन पर पड़ने वाला असर बहुत बड़ा हो सकता है।
किसी महिला को उसके काम की प्रकृति देखकर छोटा समझना आसान है, लेकिन यह भूलना नहीं चाहिए कि वही महिला अपने काम से कई दूसरे परिवारों को सहारा दे सकती है।
एक महिला का आत्मनिर्भर होना सिर्फ उसकी व्यक्तिगत सफलता नहीं होती। जब वह दूसरों को भी रोजगार देने लगती है, तो उसकी सफलता का असर कई घरों तक पहुंचता है।
कभी किसी के छोटे काम को देखकर उसकी बड़ी क्षमता को मत आंकिए।
क्योंकि कई बार दुकान छोटी होती है, लेकिन उसके अंदर पल रहे सपने बहुत बड़े होते हैं।
Post a Comment