शादी के सात साल बाद जब मैंने अपने पति आरव का घर छोड़ा था, तब मुझे यकीन था कि अब हमारी राहें कभी नहीं मिलेंगी।
उस दिन सुबह-सुबह मैंने अपना छोटा सा बैग उठाया, अलमारी में रखी शादी की तस्वीर को आखिरी बार देखा और बिना पीछे मुड़े दरवाजा बंद कर दिया।
मेरी आंखों में आंसू थे, लेकिन दिल में गुस्सा उससे कहीं ज्यादा था।
आरव बुरा इंसान नहीं था। वह शराब नहीं पीता था, किसी दूसरी औरत के पीछे नहीं भागता था, न ही मुझ पर हाथ उठाता था। लेकिन कभी-कभी रिश्ते किसी एक बड़ी गलती से नहीं, बल्कि हजारों छोटी-छोटी बातों से टूटते हैं।
हमारे बीच बातचीत खत्म हो चुकी थी।
एक ही घर में रहते हुए भी हम अजनबी बन चुके थे।
मैं कुछ कहती तो वह काम में व्यस्त होने का बहाना बना देता।
वह कुछ कहना चाहता तो मैं सुनना नहीं चाहती थी।
धीरे-धीरे हमारे बीच केवल खामोशी बची थी।
और वही खामोशी एक दिन दीवार बन गई।
उस रात हमारी बहुत बड़ी बहस हुई थी।
मैंने गुस्से में कहा था, "अब मैं तुम्हारे साथ एक पल भी नहीं रह सकती।"
उसने भी पहली बार गुस्से में जवाब दिया था, "अगर जाना चाहती हो तो चली जाओ।"
बस...
मैं चली गई।
मुझे उम्मीद थी कि वह मुझे रोक लेगा।
लेकिन उसने नहीं रोका।
शायद उसे भी लगा होगा कि मैं वापस आ जाऊंगी।
लेकिन मैं नहीं लौटी।
मैं अपने मायके चली गई और कुछ महीनों बाद नौकरी के लिए दूसरे शहर चली गई।
समय धीरे-धीरे गुजरता गया।
पहले कुछ महीने बहुत मुश्किल थे।
हर सुबह उसकी याद आती।
हर रात उसका चेहरा आंखों के सामने घूम जाता।
लेकिन मेरा अहंकार मुझे वापस जाने नहीं देता था।
मैं खुद को समझाती रहती कि मैंने सही फैसला लिया है।
फिर एक दिन खबर मिली कि आरव ने भी दूसरी जगह ट्रांसफर ले लिया है।
अब हमारे बीच केवल दूरी ही नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी खड़ी हो चुकी थी।
दो साल गुजर गए।
इन दो सालों में हमने एक-दूसरे से बात तक नहीं की।
न कोई फोन।
न कोई मैसेज।
न कोई हालचाल।
ऐसा लगने लगा था जैसे हम कभी मिले ही नहीं थे।
फिर एक दिन किस्मत ने ऐसा खेल खेला जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी।
मैं एक ट्रेन में सफर कर रही थी।
मुझे अपनी कंपनी के काम से दूसरे शहर जाना था।
ट्रेन में बहुत भीड़ थी।
मैं अपनी सीट पर बैठी खिड़की से बाहर देख रही थी।
अचानक किसी ने सामने वाली सीट पर बैग रखा।
मैंने बिना ध्यान दिए नजर उठाई...
और मेरे हाथ कांप गए।
वह आरव था।
दो साल बाद।
हम दोनों एक-दूसरे को देखकर कुछ सेकंड तक चुप रहे।
जैसे समय अचानक रुक गया हो।
उसके चेहरे पर पहले से ज्यादा गंभीरता थी।
बालों में कुछ सफेदी भी दिखाई दे रही थी।
शायद जिंदगी ने उसे भी मेरी तरह बहुत कुछ सिखाया था।
"कैसी हो?" उसने धीरे से पूछा।
मैंने भी बस इतना कहा, "ठीक हूं।"
फिर दोनों चुप।
पूरे दो सालों की कहानी हमारे बीच बैठी थी।
लेकिन शब्द कहीं खो गए थे।
ट्रेन आगे बढ़ती रही।
कुछ घंटों बाद धीरे-धीरे बातचीत शुरू हुई।
पहले नौकरी की बातें हुईं।
फिर परिवार की।
फिर पुरानी यादों की।
और पता ही नहीं चला कि कब हम हंसने लगे।
वही हंसी जो कभी हमारे रिश्ते की पहचान हुआ करती थी।
रात हो गई।
ट्रेन की लाइटें धीमी हो गईं।
ज्यादातर लोग सो चुके थे।
मैं खिड़की के पास बैठी बाहर अंधेरे को देख रही थी।
तभी आरव ने धीमी आवाज में कहा,
"तुम्हारे जाने के बाद घर बहुत खाली हो गया था।"
मैंने उसकी तरफ देखा।
वह पहली बार दिल की बात कर रहा था।
"मुझे लगता था तुम वापस आ जाओगी।"
उसकी आंखों में हल्की नमी थी।
"और मुझे लगता था तुम मुझे लेने आओगे।"
मेरे मुंह से भी सच निकल गया।
हम दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर अचानक हम दोनों हंस पड़े।
क्योंकि जिस रिश्ते को हमने खत्म समझ लिया था, वह केवल गलतफहमियों का शिकार हुआ था।
न वह मुझे छोड़ना चाहता था।
न मैं उसे।
लेकिन दोनों अपने-अपने अहंकार के कैदी बन गए थे।
उस रात हमने पहली बार खुलकर बात की।
हर शिकायत।
हर दर्द।
हर अधूरी बात।
सब कुछ।
सुबह होने तक ऐसा लगा जैसे दिल का वर्षों पुराना बोझ उतर गया हो।
जब ट्रेन अपने अंतिम स्टेशन पर पहुंची, तब हमें अलग-अलग दिशाओं में जाना था।
मैं प्लेटफॉर्म पर उतर गई।
वह भी उतर गया।
कुछ पल तक हम दोनों खामोश खड़े रहे।
फिर उसने कहा,
"क्या हम फिर से शुरुआत कर सकते हैं?"
मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई।
यह वही सवाल था जिसका इंतजार मैंने दो साल तक किया था।
मेरी आंखों में आंसू आ गए।
मैंने मुस्कुराकर कहा,
"शायद किस्मत हमें यही बताना चाहती थी कि कुछ रिश्ते टूटने के लिए नहीं, संभलने के लिए बनते हैं।"
आरव ने पहली बार मेरा हाथ पकड़ा।
और इस बार मैंने उसे छोड़ा नहीं।
उस दिन मुझे समझ आया कि प्यार हमेशा बड़े-बड़े वादों में नहीं होता।
कभी-कभी प्यार उस इंसान में होता है जो सालों बाद भी तुम्हें देखकर वही मुस्कान दे सके।
मैंने पति को छोड़ा था...
लेकिन किस्मत ने हमें फिर मिलवा दिया।
और इस बार हमने एक-दूसरे को नहीं, अपने अहंकार को छोड़ा।
अगर आपकी जिंदगी में कोई ऐसा इंसान हो जिसे आपने गुस्से या गलतफहमी में खो दिया हो, और किस्मत आपको उससे दोबारा मिलवा दे, तो क्या आप उसे दूसरा मौका देंगे?
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