जब पतिदेव ने मुझे बस स्टैंड पर छोड़ा, तो उनके चेहरे पर एक छिपी हुई मुस्कान थी। पिछले तीन दिनों से घर में यही बहस चल रही थी—"तुम जाओगी तो मुझे थोड़ी शांति मिलेगी," "मैं अपनी मर्जी से सोऊंगा," और "कम से कम चार दिन कोई टोकने वाला नहीं होगा।"
मैंने खिड़की से चिढ़ाते हुए कहा, "देख लेना, कल तक फोन करके रोने मत लगना कि खाना कहाँ रखा है।"
पतिदेव ने हंसते हुए जवाब दिया, "अरे बाबा, तुम जाओ तो सही! मैं तो 'आजाद पंछी' बनने की तैयारी कर चुका हूँ।"
घर लौटते ही उन्होंने सोफे पर पैर पसारे। न कोई पूछने वाला कि "हाथ धोए या नहीं?" और न ही टीवी पर सास-बहू के सीरियल का शोर। उसने रात के खाने में सिर्फ मैगी बनाई, सीधे पतीले से खाई और सिंक में बर्तन वैसे ही छोड़ दिए। उसे लगा, यही तो असली 'ऐश' है।
अगली सुबह 8:00 बजे तक वो सोते रहे। जब नींद खुली, तो घर में वो चिर-परिचित चिड़चिड़ाहट नहीं थी— "उठिए, चाय ठंडी हो रही है!"
अलमारी खोली तो प्रेस किए हुए कपड़े खत्म हो चुके थे। रसोई में गया तो चाय की पत्ती का डिब्बा ही नहीं मिला। इसलिए बिना चाय पीए ही आफिस चला गया।
शाम को ऑफिस से थका-हारा घर लौटा, तो दरवाजा खोलने वाला कोई नहीं था। घर की शांति, जो कल तक सुकून दे रही थी, अब काटने को दौड़ रही थी।
उन्होने मुझे फोन लगाया।
"सुनो, वो नीली वाली टी-शर्ट कहाँ है?
मैंने (हंसते हुए) "कहा था न! अलमारी के तीसरे रैक में पीछे की तरफ देखो। वैसे, ऐश हो रही है न? कोई टोकने वाला तो नहीं है?"
वो चुप हो गये।
उन्होंने देखा कि मेज पर धूल जमी है, सिंक में बर्तनों का ढेर है और फ्रिज में रखा दूध फटने वाला है। उसे याद आया कि कैसे सुनीता बीमार होने पर भी घर को सहेज कर रखती थी, और वो सिर्फ एक छुट्टी में सब बिखेर बैठा था।
चौथे दिन मेरी वापसी थी। वो दो घंटे पहले ही स्टेशन पहुँच गया। जैसे ही मै ट्रेन से उतरी, उन्होंने लपक कर मेरा बैग थाम लिया।
"अरे? तुम तो कह रहे थे कि मेरे बिना तुम्हें स्वर्ग मिल गया है?" मै ने शरारत से पूछा।
उनकी आवाज थोड़ी भारी हो गई, "स्वर्ग तो था सुनीता, पर वो घर जैसा नहीं लग रहा था। बिना शोर के शांति भी शोर मचाती है, ये मुझे आज समझ आया।"
उन्होने मेरा हाथ कस कर पकड़ा और कहा, "अगली बार जब मायके जाने की बात करोगी, तो मैं भी साथ चलूँगा। अकेले रहकर 'ऐश' करने से बेहतर है तुम्हारे साथ रहकर थोड़ी नोक-झोंक सह लेना।"
यह कहानी दिखाती है कि अक्सर पुरुष जिसे आजादी समझते हैं, असल में वह उस व्यवस्था की कमी होती है जो एक पत्नी अपने धैर्य से बनाए रखती है।
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