एक बार की बात है। एक राजा का दरबार लगा हुआ था। दरबार में कई अपराधियों को पकड़कर लाया गया था और राजा को उनके अपराधों के अनुसार फैसला सुनाना था।
दरबार में मंत्री, सेनापति, व्यापारी और दूसरे दरबारी भी मौजूद थे।
फैसले की कार्रवाई शुरू होने ही वाली थी कि अचानक राजा ने अपने मंत्री की तरफ देखा और एक अलग ही सवाल पूछ लिया।
राजा ने पूछा—
“मंत्री जी, आपका महीने का खर्च कितना आता है?”
मंत्री ने हाथ जोड़कर जवाब दिया—
“महाराज, मेरा महीने का खर्च करीब 2000 मुद्राएं है।”
राजा ने सिर हिलाया।
इसके बाद उसने दरबार में बैठे दूसरे लोगों से भी उनके मासिक खर्च के बारे में पूछना शुरू कर दिया।
किसी ने कहा 1500 मुद्राएं, किसी ने 3000 तो किसी ने इससे भी ज्यादा।
तभी राजा की नजर दरबार में बैठे एक जुआरी पर पड़ी।
राजा ने उससे भी वही सवाल पूछ लिया—
“बताओ, तुम्हारा महीने का खर्च कितना है?”
जुआरी यह सवाल सुनते ही थोड़ा सकपका गया।
उसने हाथ जोड़कर कहा—
“महाराज, मेरा खर्च छोड़ दीजिए। आप अपने दरबारियों का खर्च ही पूछते रहिए।”
लेकिन राजा के सामने वह अपनी बात टाल नहीं सकता था।
राजा ने कहा—
“नहीं, अब तुम्हारी बारी है। तुम्हें भी बताना पड़ेगा।”
जुआरी ने कुछ पल सोचा और फिर बेहद गंभीर चेहरा बनाकर बोला—
“महाराज, मेरा खर्च इतना है कि अगर मैं चाहूं तो आपके इस पूरे दरबार और महल को एक दिन में सात बार बेच दूं।”
जुआरी की बात सुनते ही पूरा दरबार सन्न रह गया।
राजा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
“क्या कहा? मेरे महल को सात बार बेच सकते हो? आखिर ऐसा क्या करते हो कि तुम्हारा इतना खर्च है?”
जुआरी ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया—
“महाराज, मैं खर्च नहीं करता…”
राजा ने पूछा—
“तो फिर?”
जुआरी मुस्कुराया और बोला—
“बस जुआ खेलता हूं!”
दरबार में बैठे लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
जुआरी ने आगे कहा—
“जुए में जीतने की कोई गारंटी नहीं होती, लेकिन हारने की पूरी जिम्मेदारी मेरी होती है।”
राजा कुछ क्षण तक उसे देखता रहा।
फिर दरबार में हंसी का माहौल बन गया।
जुआरी ने शायद मजाक में बात कही थी, लेकिन उसकी बात में एक कड़वी सच्चाई भी छिपी थी।
जुए में आदमी जितना जीतने की उम्मीद लेकर बैठता है, उससे कहीं ज्यादा हारने का जोखिम लेकर बैठता है।
और सबसे बड़ी बात यह कि जुए में खर्च की कोई सीमा तय नहीं होती।
आज थोड़े पैसे हारने वाला व्यक्ति सोच सकता है कि अगली बाजी में सब वापस जीत जाएगा। इसी उम्मीद में वह फिर पैसा लगाता है और कई बार नुकसान बढ़ता चला जाता है।
कहानी की सीख
जुए में जीत का लालच अक्सर इंसान को ऐसी जगह पहुंचा देता है जहां वह अपनी मेहनत की कमाई भी गंवा सकता है।
जिस काम में जीत की कोई गारंटी नहीं और नुकसान की कोई सीमा नहीं, उसमें समझदारी इसी में है कि इंसान अपने कदम संभालकर रखे।
और जुआरी की बात भले ही मजाकिया थी—
“जीतने की कोई गारंटी नहीं, लेकिन हारने की पूरी जिम्मेदारी मेरी है।”
लेकिन यही वाक्य उसकी पूरी कहानी का सबसे बड़ा सबक बन जाता है।
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