सास की मौत को परिवार ने सामान्य माना... लेकिन बहू को उनके कमरे से मिली डायरी ने पूरे घर को शक के घेरे में ला दिया


रात के करीब 11 बजे काव्या ने अपनी सास सरोज देवी के कमरे की सफाई शुरू की।

सरोज देवी की मौत को तीन महीने हो चुके थे।

परिवार के अनुसार उनकी तबीयत पिछले कुछ समय से खराब थी और एक रात अचानक उनकी हालत बिगड़ गई थी।

डॉक्टर ने इसे प्राकृतिक मृत्यु बताया था।

घर में सबने यही मान लिया था कि उम्र और बीमारी के कारण उनकी मौत हुई।

लेकिन काव्या को हमेशा एक बात परेशान करती थी।

मौत से ठीक एक दिन पहले सरोज देवी ने उससे कहा था—

"अगर मुझे कुछ हो जाए तो मेरी पुरानी अलमारी की तीसरी दराज जरूर देखना।"

काव्या ने उस समय इसे बुजुर्ग महिला की सामान्य चिंता समझकर टाल दिया था।

लेकिन उस रात अचानक उसे वह बात याद आ गई।


तीसरी दराज में मिली पुरानी डायरी

काव्या ने अलमारी खोली।

पहली दराज में पुराने कपड़े थे।

दूसरी में कुछ धार्मिक पुस्तकें।

तीसरी दराज खोलते ही उसे एक पुरानी काली डायरी दिखाई दी।

डायरी के ऊपर धूल जमी थी।

काव्या ने उसे उठाया।

पहले पन्ने पर लिखा था—

"अगर यह डायरी किसी के हाथ लगे, तो मेरी मौत को सामान्य मत समझना।"

काव्या के हाथ कांपने लगे।

उसने तुरंत कमरे का दरवाजा बंद कर दिया।


डायरी में था पूरे परिवार का जिक्र

पहले कुछ पन्नों में घर के रोजमर्रा के खर्च लिखे थे।

लेकिन आगे बढ़ते ही सरोज देवी ने परिवार के लोगों के बारे में अलग-अलग बातें लिखी थीं।

पति महेन्द्र

बेटा राघव

बहू काव्या।

और छोटी बेटी निधि

हर नाम के सामने कुछ तारीखें और छोटे-छोटे नोट लिखे थे।

काव्या सबसे ज्यादा तब डर गई जब उसने अपने नाम के सामने लिखा पढ़ा—

"काव्या निर्दोष है। लेकिन उसे सच से दूर रखना जरूरी है।"

वह कुछ समझ नहीं पाई।


अगला पन्ना और भी चौंकाने वाला था

सरोज देवी ने लिखा था कि पिछले कुछ महीनों से घर से पैसे गायब हो रहे थे।

उन्हें शक था कि परिवार का कोई सदस्य चोरी कर रहा है।

लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा डर इस बात का था कि चोरी के पीछे सिर्फ पैसा नहीं था।

कुछ पुराने दस्तावेज भी गायब हुए थे।

वे दस्तावेज उनके दिवंगत पिता की संपत्ति से जुड़े थे।

सरोज देवी को लगता था कि कोई व्यक्ति उस संपत्ति पर कब्जा करना चाहता है।


फिर डायरी में आया एक नाम

काव्या ने अगला पन्ना पलटा।

वहां सिर्फ एक नाम लिखा था—

"विनय"

विनय परिवार का दूर का रिश्तेदार था।

वह पिछले कुछ महीनों से अक्सर घर आता था।

सरोज देवी ने लिखा था—

"विनय मुझसे कुछ छिपा रहा है। मुझे लगता है उसे उस पुराने दस्तावेज के बारे में पता है।"

काव्या के मन में सवाल उठा—

अगर सरोज देवी को इतना शक था तो उन्होंने पुलिस को क्यों नहीं बताया?


आखिरी सात दिनों की डायरी

डायरी के अंतिम हिस्से में लिखावट बदल गई थी।

शब्द जल्दी-जल्दी लिखे गए थे।

पहली तारीख—

"आज फिर अलमारी खुली मिली।"

दूसरी—

"कोई मेरे कमरे में रात में आता है।"

तीसरी—

"मैंने कदमों की आवाज सुनी।"

चौथी—

"अब मुझे डर लगने लगा है।"

और फिर आखिरी पन्ने पर लिखा था—

"अगर मेरी मौत अचानक हो जाए, तो मेरी दवाइयों की जांच जरूर कराना।"

काव्या की सांस रुक गई।


क्या सरोज देवी की मौत सामान्य नहीं थी?

काव्या ने उसी रात अपने पति राघव को डायरी दिखाई।

राघव पहले तो विश्वास नहीं कर पाया।

उसने कहा—

"मां ने कभी मुझे यह बात नहीं बताई।"

काव्या ने पूछा—

"लेकिन उनकी दवाइयां कौन लाता था?"

राघव ने कहा—

"अधिकतर पिताजी। कभी-कभी विनय भी।"

दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।


पुरानी दवाइयों का डिब्बा मिला

अगली सुबह काव्या ने सरोज देवी की पुरानी दवाइयों का डिब्बा ढूंढा।

कुछ दवाइयां सामान्य थीं।

लेकिन एक छोटी शीशी पर डॉक्टर की लिखावट नहीं थी।

काव्या ने उसे देखकर तुरंत डॉक्टर से संपर्क किया।

डॉक्टर ने कहा कि वह शीशी उनकी लिखी हुई दवा नहीं थी।

अब मामला गंभीर हो चुका था।


परिवार में शुरू हुआ शक

काव्या ने यह बात ससुर महेन्द्र को बताई।

उनका चेहरा अचानक बदल गया।

उन्होंने कहा—

"पुरानी बातें भूल जाओ। तुम्हारी सास बीमार थीं।"

काव्या ने पूछा—

"तो यह दवा किसने दी थी?"

महेन्द्र चुप हो गए।

यही चुप्पी काव्या के लिए सबसे बड़ा सवाल बन गई।

उसी शाम महेन्द्र घर से बाहर चले गए।

राघव ने उनका पीछा किया।

वह सीधे विनय से मिलने पहुंचे।


दोनों के बीच क्या बात हुई?

राघव दूर खड़ा होकर उन्हें देख रहा था।

महेन्द्र ने विनय से कहा—

"वह डायरी तुम्हें नहीं मिलनी चाहिए थी।"

विनय ने जवाब दिया—

"मुझे भी नहीं पता था कि मांजी ने सब लिख दिया है।"

राघव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

उसे अब यकीन हो गया कि उसकी मां की मौत के पीछे कोई राज जरूर था।


लेकिन असली कहानी कुछ और थी

राघव ने दोनों का सामना किया।

महेन्द्र ने आखिरकार सच बताया।

सरोज देवी ने कुछ महीने पहले पता लगाया था कि परिवार की जमीन के पुराने दस्तावेजों में छेड़छाड़ की गई है।

विनय इस मामले में शामिल था।

महेन्द्र को इसकी जानकारी थी।

लेकिन उन्होंने पुलिस को बताने के बजाय परिवार की बदनामी के डर से बात दबाने की कोशिश की।

सरोज देवी इस फैसले से नाराज थीं।

उन्होंने कहा था कि वह सब कुछ पुलिस को बताएंगी।


फिर मौत वाली रात क्या हुआ?

जांच दोबारा शुरू हुई।

सरोज देवी की पुरानी दवाइयां जांच के लिए भेजी गईं।

रिपोर्ट में एक संदिग्ध पदार्थ के अंश मिले।

अब उनकी मौत को दोबारा जांच के दायरे में लिया गया।

लेकिन यह साबित करना अभी बाकी था कि वह पदार्थ किसने दिया।

तभी डायरी का एक और पन्ना सामने आया।

उसमें लिखा था—

"मुझे अपने घर के किसी आदमी से डर नहीं, मुझे डर है कि मेरा भरोसा ही मेरे खिलाफ इस्तेमाल हो रहा है।"


आखिरी खुलासा

जांच में सामने आया कि सरोज देवी की नियमित दवाइयां बदलने का मौका सिर्फ एक व्यक्ति को मिलता था।

वह था—

विनय।

लेकिन पुलिस को उसके खिलाफ पर्याप्त प्रमाण नहीं मिला था।

तभी काव्या ने एक पुराना बिल दिखाया।

उस बिल में वही दवा दर्ज थी जो सरोज देवी की मृत्यु से कुछ दिन पहले खरीदी गई थी।

खरीददार का नाम विनय था।

अब पुराने दस्तावेज, डायरी और दवा से जुड़े रिकॉर्ड एक-दूसरे से जुड़ने लगे।

विनय को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई।


मगर डायरी का आखिरी राज

काव्या ने डायरी का आखिरी पन्ना दोबारा पढ़ा।

वहां सरोज देवी ने लिखा था—

"अगर काव्या यह डायरी पढ़ रही है, तो समझना कि मैंने सही इंसान पर भरोसा किया था।"

काव्या की आंखों में आंसू आ गए।

उसे समझ आया कि उसकी सास ने उसे पहले ही सच का रास्ता दिखा दिया था।

जिस महिला की मौत को परिवार ने तीन महीने तक सामान्य समझा...

उसकी आखिरी इच्छा थी कि सच कभी दबाया न जाए।


अंत

काव्या ने डायरी को संभालकर रख दिया।

अब वह सिर्फ एक पुरानी डायरी नहीं थी।

वह एक ऐसी महिला की आखिरी गवाही थी, जिसने अपने ही घर में छिपे रहस्य को महसूस कर लिया था।

और इस कहानी ने पूरे परिवार को एक बात समझा दी—

कभी-कभी अपराध का सबसे बड़ा सुराग किसी पुलिस फाइल में नहीं, बल्कि उस इंसान की लिखी आखिरी डायरी में छिपा होता है, जिसे सब कुछ पता था लेकिन वह बोल नहीं सकी।

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