लेक वुड विला
शर्मा परिवार—रमेश, उसकी पत्नी सीमा, और सात साल की बेटी प्रिया—ने ऊटी के बाहरी इलाके में ‘लेकवुड विला’ नामक एक पुराना बंगला खरीदा। दशकों से वीरान पड़े इस घर के बारे में स्थानीय लोगों के बीच अजीब कानाफूसी थी। रमेश शहर की आपाधापी से दूर शांति चाहता था, और यह विशाल, जर्जर संपत्ति अपनी ऐतिहासिक वास्तुकला के साथ उसे भा गई थी। लेकिन बंगले की खिड़कियों से झाँकती उदासी और वहाँ छाई रहस्यमय चुप्पी ने सीमा को असहज कर दिया। रमेश ने इसे पुरानी इमारत का असर कहकर टाल दिया। प्रिया को तो शुरू से ही लगा, जैसे कोई अनदेखी नज़र उस पर लगातार बनी हुई है।
शुरुआती हफ्तों में, घर में अजीबोगरीब घटनाएँ घटने लगीं। रसोई से हल्की खड़खड़ाहट की आवाज़ें आतीं, जबकि वहाँ कोई नहीं होता था। प्रिया के कमरे से रात के अँधेरे में फुसफुसाहट सुनाई देती, जिसे उसके माता-पिता अक्सर हवा या पुरानी दीवारों की आवाज़ समझकर नज़रअंदाज़ कर देते। सीमा को लगता, जैसे कोई उसके ठीक पीछे से गुज़रा हो, एक ठंडी हवा का झोंका उसे छूकर जाता, खासकर जब वह अकेली होती। बाथरूम के शीशे पर कभी-कभी धुंधले उंगलियों के निशान दिखते, जिन्हें वे साफ़ करते, पर वे फिर से उभर आते। ये बातें इतनी सूक्ष्म थीं कि इन्हें आसानी से अनदेखा किया जा सकता था, पर भीतर ही भीतर एक अजीब बेचैनी बढ़ा रही थीं।
धीरे-धीरे, घटनाएँ और स्पष्ट होने लगीं। प्रिया ने माता-पिता से शिकायत की कि उसके कमरे में एक “दुखी आंटी” है जो उससे बातें करती है। सीमा ने पहले इसे बच्चों की कल्पना माना, पर प्रिया उस महिला का इतना सजीव वर्णन करती कि सीमा चिंतित हो उठी। प्रिया बताती, “आंटी हमेशा सफ़ेद साड़ी पहनती हैं, उनके बाल बिखरे रहते हैं, और वे बहुत उदास दिखती हैं।” रात को, प्रिया अक्सर डरकर जाग जाती और कहती कि आंटी उसके बिस्तर के पास खड़ी थीं। इन बातों ने सीमा को अंदर तक हिला दिया, पर रमेश अब भी प्रिया के नए स्कूल या माहौल को इसका कारण मानकर कोई तार्किक स्पष्टीकरण खोज रहा था।
रमेश ने प्रिया की बातों को ज़्यादा गंभीरता से नहीं लिया, क्योंकि उनका मानना था कि बच्चे अक्सर कहानियाँ गढ़ते हैं। पर एक रात, उन्होंने अपनी आँखों से देखा कि प्रिया के खिलौने अलमारी से अपने आप गिर रहे थे। यह देखकर उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने बिल्ली या चूहे का संदेह किया, लेकिन जाँच करने पर कुछ नहीं मिला। इसके बाद, घर का तापमान अजीब तरह से गिरने लगा, विशेषकर प्रिया के कमरे में। कितनी भी हीटिंग जलाने पर भी वहाँ ठंड बनी रहती। घर में कभी पुरानी गुलाब की पंखुड़ियों जैसी, तो कभी गीली मिट्टी जैसी अजीबोगरीब गंध फैलने लगी। रमेश का वैज्ञानिक दिमाग भी अब इन अलौकिक घटनाओं के सामने हार मानने लगा था।
एक तूफानी दोपहर, अटारी की सफ़ाई करते हुए सीमा को एक धूल भरी संदूक मिली। उसके भीतर एक पुरानी, चमड़े से बंधी डायरी थी। यह डायरी घर की पिछली मालकिन, मिस एल्सी मॉरिस की थी, जो दशकों पहले रहस्यमय ढंग से गायब हो गई थीं। शुरुआत में डायरी में एल्सी की सामान्य दिनचर्या थी, लेकिन जैसे-जैसे पन्ने पलटते गए, उसका स्वर बदलता गया। एल्सी ने घर में एक “अदृश्य उपस्थिति” के बारे में लिखना शुरू कर दिया था, जो उसे सता रही थी। उसने लिखा था कि वह उसे महसूस कर सकती थी, उसकी फुसफुसाहट सुन सकती थी, और कभी-कभी उसकी झलक भी देख सकती थी।
डायरी में एल्सी का बढ़ता डर और व्यामोह साफ झलक रहा था। उसने लिखा था कि वह उपस्थिति उसे सोने नहीं देती, उसकी वस्तुएँ छिपा देती और उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करती थी। अंतिम प्रविष्टियाँ रोंगटे खड़े करने वाली थीं; एल्सी ने लिखा था कि वह अब अकेली नहीं है, और वह उपस्थिति अब इस घर को अपना मानती है। आख़िरी पन्ने पर, बिखरे हुए अक्षरों में केवल एक शब्द लिखा था: “वह मेरा पीछा कर रही है… मुझे अकेला छोड़ दो… यहाँ मत आओ।” उसके बाद कोई प्रविष्टि नहीं थी। इस खोज ने सीमा और रमेश को पूरी तरह हिला दिया। उन्हें एहसास हुआ कि प्रिया जिस “दुखी आंटी” की बात कर रही थी, वह शायद मिस एल्सी मॉरिस की आत्मा ही थी, जो अब भी इसी घर में फँसी हुई थी।
उसी रात, घर में दहशत का माहौल छा गया। तेज़ हवा चल रही थी और बिजली चमक रही थी। अचानक, प्रिया के कमरे से एक दिल दहला देने वाली चीख सुनाई दी। रमेश और सीमा तुरंत भागकर पहुँचे। उन्होंने देखा कि प्रिया अपने बिस्तर पर सहमी हुई सिकुड़ी थी, उसकी आँखें किसी अदृश्य चीज़ पर टिकी थीं। कमरे की हवा अचानक ठंडी और सड़ी हुई गंध से भर गई, मानो वहाँ कुछ जम गया हो। फिर, खिलौने अपने आप हवा में तैरने लगे और दीवारों से टकराने लगे। एक अदृश्य शक्ति ने रमेश को उठाया और ज़ोर से दीवार पर दे मारा। वह दर्द से कराह उठा। सीमा ने देखा, कोई अदृश्य चीज़ प्रिया को कसकर पकड़े हुए उसे अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रही थी।
रमेश ने बिना सोचे-समझे प्रिया को उठाया और सीमा के साथ दरवाज़े की ओर भागे। उन्हें महसूस हुआ जैसे कोई अदृश्य साया उनके पीछे आ रहा है, उनकी एड़ियों को छू रहा है। बिना एक पल पीछे मुड़े, वे गाड़ी में बैठे और जितनी तेज़ी से हो सके, वहाँ से निकल गए। उन्होंने ‘लेकवुड विला’ को फिर कभी पलटकर नहीं देखा। उस रात की भयावहता उनके ज़ेहन में हमेशा के लिए समा गई। वे कभी उस घर में वापस नहीं गए, और वह बंगला आज भी ऊटी के बाहरी इलाके में वीरान खड़ा है, अपनी डरावनी कहानियों को अपनी दीवारों में समेटे हुए। स्थानीय लोग आज भी उस घर से दूर रहते हैं, यह मानते हुए कि मिस एल्सी मॉरिस की आत्मा आज भी वहाँ भटक रही है, उस अदृश्य उपस्थिति के डर से, जिसने उसे कभी अकेला नहीं छोड़ा
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