एक मुर्तिकार दो एक जैसी बहुत उत्तम दर्जे की मुर्तियां बनाकर दरबार में ले गया। राजा के मंत्री, रानी, खुद राजा उन मुर्तियों को देखकर आश्चर्यचकित रह गए, दोनों मुर्तियां एक जैसी और बहुत सुंदर थीं।
राजा ने मुर्तिकार से उनके दाम पूछे। मुर्तिकार ने कहा कि महाराज इनमें से एक मुर्ति 1 लाख की है जबकि दुसरी मुर्ति महज 2 कौड़ी की है। राजा हैरान हुआ और बोला कि मेरे मंत्री, रानी और मैंने खूब चारों ओर घुमकर देख लिया मुर्तियों में कोई अंतर नहीं है फिर दोनों के दाम में इतना अंतर क्यों है?
मुर्तिकार ने कहा कि यही बात आप लोगों को बतानी है कि इनके दाम में इतना अंतर क्यों है। राजा और उसके आदमियों ने फिर बारीकी से निरीक्षण किया लेकिन कोई अंतर न ढुंढ सके, अतः राजा ने मुनादी करवा दी कि जो कोई भी इन मुर्तियों में से एक लाख वाली और दो कौड़ी वाली मुर्ति पहचान लेगा उनमें अंतर बता देगा उसे मालामाल कर दूंगा।
बहुत लोग दरबार में आए मगर कोई कुछ नहीं बता सका। तभी एक लाठी टेकता हुआ बुजुर्ग दरबार में आया और मुर्तियों के चारों तरफ घुमने के बाद उसने एक लकड़ी का टुकड़ा उठाकर एक मुर्ति के कान में डाल दिया टुकड़ा सीधा मुर्ति के पेट में जा गिरा। उसके बाद बुजुर्ग ने एक और लकड़ी उठाई और दुसरी मुर्ति के कान में डाल दी लेकिन वह लकड़ी पेट में जाने की बजाय मुर्ति के मुंह से बाहर निकल आई।
तभी बुजुर्ग राजा की तरफ मुड़ा और कहा महाराज जिस मुर्ति के कान से लकड़ी उसके पेट में जा गिरी वह एक लाख की है और जिस मुर्ति के मुंह से बाहर निकल गई वह मात्र दो कौड़ी की है।
बुजुर्ग की बात सुनकर राजा ने मुर्तिकार की तरफ देखा तो मुर्तिकार बोला कि महाराज बुजुर्ग बिल्कुल सही कह रहे हैं। राजा ने कहा कि बात कुछ समझ नहीं आई?
मुर्तिकार बोला कि महाराज जो आदमी कान से सुनकर मुंह से बक दे वह दो कौड़ी का होता है और जो कान से सुनकर बात को पेट में हज़म कर लेता है वो लाख रुपए का होता है।
इंसान की कीमत उसके ज्ञान, रूप या दिखावे से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह सुनी हुई बात को अपने भीतर रख सकता है या हर बात दूसरों तक पहुँचा देता है।
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