श्लोक
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्। तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति॥
अर्थ: जैसे हजारों गायों में बछड़ा अपनी माँ को ढूँढ़ लेता है, वैसे ही मनुष्य के कर्म उसे खोज ही लेते हैं।
एक राजा ने अपने गुरु से पूछा—"क्या कोई ऐसा स्थान है जहाँ जाकर मनुष्य अपने पापों से बच सकता है?"
गुरु मुस्कुराए और बोले—"यदि अपने कर्मों से भागने की कोई जगह होती, तो सबसे पहले राजा वहीं छिप जाते।"
गरुड़ पुराण भी कुछ ऐसा ही संदेश देता है। इसमें बार-बार कहा गया है कि मृत्यु के बाद मनुष्य से उसका नाम, धन, परिवार या पद नहीं पूछा जाता। सबसे पहले उसके कर्मों का लेखा सामने आता है। जीवन में किए गए छोटे-से-छोटे अच्छे और बुरे कर्म भी व्यर्थ नहीं जाते।
यही कारण है कि सनातन धर्म में केवल मंदिर जाने को धर्म नहीं कहा गया। किसी भूखे को भोजन देना, किसी दुखी को सहारा देना, माता-पिता की सेवा करना, सत्य बोलना और किसी का विश्वास न तोड़ना—ये भी उतने ही बड़े धार्मिक कर्म माने गए हैं।
सोचिए...
यदि आज आपको अपने जीवन की एक ही चीज़ साथ ले जाने का अवसर मिले, तो क्या आप अपना बैंक बैलेंस चुनेंगे... या अपने कर्म?
शायद इसी प्रश्न का उत्तर गरुड़ पुराण हर मनुष्य से चाहता है।
आपके अनुसार ऐसा कौन-सा कर्म है जिसका फल मनुष्य को इस जीवन में भी मिलता है और मृत्यु के बाद भी? अपनी राय कमेंट में लिखिए।
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