घर में घुसते ही बेटे ने कहा - पापा ! माँ की अंगुली कट गयी आज । बहुत खून निकला था ।
रसोई में देखा तो बीबी रोटियाँ सेंक रही थी । कपड़े उतार कर खूंटी पर टाँगे और मुंह हाथ धोकर पत्नी से बोला - क्या हो गया हाथ को ?
- नया चाकू था सो सब्जी काटते हुए अंगूठा कट गया ।
- और फिर भी तुम लगी हुई हो , क्या खाना मैं नहीं बना सकता था ?
- तुम भी तो थके हारे आते हो सारा दिन लोगों की झूठन साफ करके मालिक की बिना बात की डांट फटकार सुनकर ...
- उस पर मैं भी तुमसे काम करवाऊं...मुझे नहीं होगा ये ...
- कमाल करती हो तुम भी , ये गाँव नहीं है , यहाँ तो औरतें पैर तक दब बाती हैं और तुम हो कि मुझे रसोई भी न बनाने दोगी ।
- बैठो यहाँ , मैं तुम्हें गरम रोटी परोसती हूँ ।
- जैसे ही सब्जी से अंगुली के पोर छूए मुंह से सिसकारी निकल गयी। बेटे को बगल में बैठा कर उसके मुंह में भी निवाले देता गया पति ।
- लाओ थाली मुझे दे दो । और वह पति की थाली में अपने लिए खाना परोस खाने लगी । तुम आराम करो मैं जरा रसोई सम्हाल लूँ ।
- खाना खाकर बाहर आओ ।
- क्या हो गया जी ? ऐसे क्यों चिल्ला रहे हो ? पत्नी रसोई से बाहर आते हुए बोली ।
पति रसोई में घुसा और बर्तन साफ करने लगा । उसके भी हाथों को आज बर्तन धोने में जलन हो रही थी , मगर सारे बर्तन चमका कर ही बाहर निकला ।
- ये आज अच्छा नहीं किया तुमने , मेरे रहते तुम ने बर्तन साफ किए ...और वह सुबकने लगी
आँसू पोंछने के लिए पति ने जैसे ही चेहरे को छुआ तो हाथों की हालत गालों ने बयान कर दी । हाथों को होंठों से चूमते हुए बोली - कैसे आदमी हो तुम ? दर्द को रोजी बनाए फिरते हो और आज मेरा भी दर्द अपना बना लिया ।
जलन का मीठा एहसास आँखों की चमक और प्यार की मिठास बढ़ा
गया था
हमेशा याद रखिए रोजी रोटी के लिए निकला हुआ एक मजबूर इंसान भी अपने घर का (मुखिया) मालिक होता है
वो अपने परिवार की दो वक्त की रोटी के लिए निकला हुआ है उसका भी आत्म सम्मान होता है ..
हम सभी का ये कर्तव्य है कि हमारी वजह से किसी का भी आत्म सम्मान आहत ना हो ...
सभी का सम्मान कीजिए
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