एक बार नारद जी ने देखा कि एक साधारण सा भक्त जंगल में बैठा निरंतर कृष्ण का नाम जप रहा था। उसके पास न रहने को घर था, न खाने को भोजन, पर उसके चेहरे पर गजब का संतोष था। नारद जी ने कृष्ण से पूछा, प्रभु यह आपका इतना अनन्य भक्त है, फिर भी आप इसे इतनी गरीबी और कष्ट में क्यों रखे हुए हैं? श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, नारद, मैं इसे कष्ट में नहीं, बल्कि सुरक्षा में रखे हुए हूँ। चलो, आज तुम्हें इसका कारण दिखाते हैं।
भगवान ने उस भक्त के सामने प्रकट होकर कहा, पुत्र मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। मांगो, क्या चाहिए? धन, राज-पाठ या स्वर्ग का सुख? भक्त ने आँखें खोलीं और शांत भाव से बोला, प्रभु यदि आप प्रसन्न हैं, तो बस इतना कीजिए कि मेरी इस फटी हुई चादर को सिलने के लिए मुझे एक सुई दे दीजिए।
नारद जी हैरान रह गए! उसने साक्षात् भगवान से केवल एक सुई मांगी?
जब भगवान अंतर्ध्यान हो गए, तो नारद जी ने उस भक्त से पूछा, मूर्ख! तूने राज-पाठ क्यों नहीं मांगा? भक्त हंसा और बोला, देवर्षि, अगर मैं राज-पाठ मांगता, तो मेरा ध्यान उस राज्य को संभालने में लग जाता और मैं अपने कृष्ण को भूल जाता। अभी मेरे पास कुछ नहीं है, इसलिए मेरा पूरा समय और मन केवल उन्हीं में लगा रहता है। उन्होंने सुई इसलिए दी ताकि मैं अपनी चादर सिलूँ और फिर से उनके भजन में लग जाऊँ।
इस प्रसंग से मिलने वाली 3 बड़ी सीख :
भगवान का कंजूस होना ही उनकी करुणा है कभी-कभी भगवान हमें वह चीज नहीं देते जो हम चाहते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि वह चीज हमें उनसे दूर कर देगी।
कृष्ण उस भक्त को प्रतीक्षा करवाते हैं जो यह सोचता है कि उसने बहुत पूजा की है इसलिए उसे फल मिलना चाहिए। लेकिन वे उसके अधीन हो जाते हैं जो सब कुछ उन पर छोड़ देता है।
जैसे ही भक्त के मन में स्व (मैं और मेरा) समाप्त होता है, वैसे ही वहां कृष्ण का प्रवेश होता है।
भक्ति के बारे में एक प्रसिद्ध पंक्ति है :
मुक्ति मांगत सब फिरैं, भक्ति न मांगै कोय,
जो कोई भक्ति को मांग ले, तो मुक्ति दासी होय।
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