आज मेरी शादी को पूरे दस साल हो चुके हैं। मेरा कसूर बस इतना था कि मैंने भारत में एक भारतीय लड़की से शादी की। वह रोज़ मुझसे लड़ती है, मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित करती है और मेरी कम आय तथा अस्थिर नौकरी को लेकर ताने देती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मैं कोर्ट में केस क्यों नहीं करता? क्योंकि मुझे उस जज या वकील की कुर्सी पर बैठे किसी भी अधिकारी से सहानुभूति की कोई उम्मीद नहीं है—चाहे वह पुरुष हो या महिला। मुझे खुद को इस बात के लिए तैयार करना होगा कि मेरा केस कितने दशकों तक चलेगा, या फिर मुझे कोर्ट के बाहर ही समझौता करना पड़ेगा। मुझे मानसिक रूप से यह भी स्वीकार करना होगा कि इस पूरे मामले में मुझ पर लाखों रुपये का खर्च आएगा, और कम आय होने के बावजूद मुझे अपनी पत्नी को भारी भरकम एलिमनी भी देनी पड़ेगी।
भारत में, चाहे पत्नी का व्यवहार कितना भी आपराधिक मानसिकता वाला क्यों न हो, उसका विवाहेतर संबंध ही क्यों न हो, वह आपके माता-पिता, भाई-बहनों से लगातार झगड़ा करती हो या घर तोड़ने का कारण ही क्यों न बन रही हो—अक्सर सज़ा एक पति को ही मिलती है। यह सज़ा होती है लंबा चलता कोर्ट केस, लाखों रुपये का खर्च, झूठे दहेज के आरोप, मानसिक उत्पीड़न और शायद जेल भी। इसलिए आज एक दुखी पति या तो आपको पहाड़ों में कहीं संन्यासी बना हुआ मिलेगा, या सर्दियों में रैन बसेरों में गरीब लोगों के साथ रात बिताता हुआ, या फिर हर तारीख़ पर कोर्ट के चक्कर लगाता हुआ दिखाई देगा। क्योंकि मैं एक मजबूर और दुखी भारतीय पति हूँ, जिसे न इंसाफ़ मिलने की उम्मीद है और न ही किसी सहानुभूति की।
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