यह कथा उस समय की है जब त्रेता युग में भगवान राम और रावण के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। लक्ष्मण जी मेघनाद के शक्ति बाण से मूर्छित हो गए थे और हनुमान जी उनके प्राण बचाने के लिए द्रोणागिरी पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर आकाश मार्ग से लंका लौट रहे थे।
हनुमान जी अत्यंत वेग से उड़ रहे थे, लेकिन जब वे दिल्ली (उस समय का खांडवप्रस्थ) के ऊपर से गुजरे, तो नीचे कल-कल बहती यमुना को देखकर उनका मन शांत हो गया। सूर्योदय होने में अभी कुछ समय शेष था। हनुमान जी ने सोचा कि एक क्षण के लिए रुककर यमुना के पावन जल से आचमन कर लिया जाए ताकि शरीर में नई ऊर्जा का संचार हो।
जैसे ही हनुमान जी नीचे उतरे, उन्होंने देखा कि यमुना के किनारे एक अत्यंत शांत स्थान है जहाँ एक श्मशान स्थित था। हनुमान जी ने वहाँ बैठकर कुछ क्षण भगवान राम का ध्यान किया।
कहा जाता है कि जब हनुमान जी वहाँ बैठे थे, तब स्वयं यमराज वहाँ प्रकट हुए। यमराज ने हनुमान जी को प्रणाम किया और कहा कि हे पवनपुत्र! यह स्थान मेरा है, यहाँ केवल वही आते हैं जिनका समय समाप्त हो चुका होता है। आप तो अमर हैं, आप यहाँ कैसे?
हनुमान जी मुस्कुराए और बोले कि हे धर्मराज, जहाँ राम का नाम है, वहाँ मृत्यु का भय कैसा? मैं तो यहाँ केवल विश्राम और यमुना पूजन के लिए रुका हूँ।
यमराज हनुमान जी की भक्ति देख गदगद हो गए। उन्होंने हनुमान जी से वरदान मांगने को कहा। तब हनुमान जी ने कहा कि इस मरघट पर जो भी प्राणी आए, उसे मृत्यु का कष्ट न हो और जो भक्त यहाँ मेरी पूजा करे, उसके जीवन के सभी संकट दूर हो जाएं। यमराज ने तथास्तु कहा और तब से इस स्थान का नाम मरघट वाले हनुमान पड़ा।
हनुमान जी जब वहाँ से चलने लगे, तो यमुना मैया प्रकट हुईं। उन्होंने कहा कि हे कपिश्रेष्ठ! आपने मेरे तट पर रुककर मुझे धन्य कर दिया। मैं वचन देती हूँ कि समय-समय पर मैं स्वयं आपके चरणों का अभिषेक करने आऊँगी।
यही कारण है कि आज भी जब दिल्ली में यमुना का जल स्तर बढ़ता है, तो पानी मंदिर की सीढ़ियों को पार कर हनुमान जी की मूर्ति के चरणों तक पहुँच जाता है। भक्त इसे कोई आपदा नहीं, बल्कि यमुना जी द्वारा हनुमान जी के चरण पखारना मानते हैं।
मंदिर के भीतर हनुमान जी की बहुत दिव्य प्रतिमा है, जिसका मुख श्मशान की ओर है, जो यह संदेश देता है कि अंत समय में भी मैं तुम्हारे साथ हूँ।
जय बजरंग बली
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