बुद्धि बनाम बल: यमलोक में हुआ सबसे बड़ा ‘माइंड गेम’!
यमराज के दरबार में गहरा सन्नाटा था। तभी एक विशाल हाथी की भारी सांसों ने उस खामोशी को तोड़ा। यमराज ने मुस्कराते हुए व्यंग्य किया!
“अरे गजराज! इतना विशाल शरीर…! फिर भी पृथ्वी से हारकर लौट आए? क्या कोई तुमसे भी शक्तिशाली मिला?”
हाथी ने शांत स्वर में उत्तर दिया...!
“महाराज, बल शरीर में नहीं, मनुष्य की बुद्धि में होता है। वह छोटा जरूर है, पर अपनी अक्ल से पूरी दुनिया चला देता है।”
यमराज हंसे, “वह नन्हा मानव? मुझे चुनौती?”
हाथी बोला, “किसी जीवित मनुष्य को बुलाइए, फिर देखिए असली कमाल!”
यमराज ने तुरंत दूतों को आदेश दिया!
“सबसे चतुर मनुष्य को सशरीर लाओ।”
आधी रात, खेत में सो रहे युवक सोमदत्त को उसकी खटिया सहित उठा लिया गया।
नींद खुली तो वह बादलों में था! डर जरूर लगा, पर दिमाग जाग गया।
“शक्ति से नहीं, बुद्धि से जीतना होगा।”
उसने तुरंत कागज पर कुछ लिखा, अंगूठा लगाया और शांत होकर लेट गया।
यमलोक में चौंकाने वाली एंट्री!
यमराज के सामने पहुँचते ही सोमदत्त ने कागज बढ़ाया।
उसमें लिखा था...!
“इस पत्र के वाहक को यमलोक का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाए।
हस्ताक्षर: नारायण”
‘नारायण’ नाम पढ़ते ही यमराज घबरा गए। आदेश मानना पड़ा, और सोमदत्त बन गया यमलोक का चीफ जस्टिस!
जब नरक के कड़ाहे ठंडे पड़ गए!
अब हर पापी के लिए सोमदत्त का फैसला! “सीधे वैकुंठ भेजो!”
नरक खाली, स्वर्ग फुल!
भगवान विष्णु स्वयं चकित होकर यमलोक पहुंचे।
उन्होंने मुस्कराकर पूछा, “वत्स, यह आदेश मैंने कब दिया?”
सोमदत्त बोला...
“प्रभु, गीता में आपने कहा, बुद्धि और स्मृति मैं ही देता हूँ। तो यह युक्ति भी आपकी ही प्रेरणा है!”
भगवान भी उसके तर्क पर मुस्करा उठे।
अंतिम चाल...
भगवान बोले, “अब पृथ्वी लौट जाओ।”
सोमदत्त झट बोला!
“प्रभु, आपके दर्शन के बाद भी अगर मुझे फिर संसार में भटकना पड़ा, तो लोग कहेंगे, दर्शन का फल भी मजदूरी ही है!”
भगवान ठहाका लगाकर बोले...
“वाह! तुम तो नारद के भी गुरु निकले। आओ, वैकुंठ का असली टिकट ले लो।”
जाते-जाते सोमदत्त ने हाथी की ओर देखकर आंख मारी।
हाथी मुस्कराया, “देखा महाराज! जीवित मनुष्य की बुद्धि, विधि का विधान भी बदल सकती है।”
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