भगवान राम एकांत में बैठे हुए थे और उनकी आंखों से अश्रु बह रहे थे। वे अपने दुख को छिपाने का प्रयास कर रहे थे।
तभी उनके परम भक्त हनुमान ने उन्हें चुपके से देख लिया। प्रभु के नेत्रों में आंसू देखकर हनुमान अत्यंत व्याकुल और दुखी हो उठे। वह तुरंत वहां से निकलकर घने वन में चले गए और भूमि पर बैठकर धरती माता से विनती करने लगे। हे माता कृपया मेरे प्रभु राम के यह आंसू मुझे लौटा दीजिए।
उनकी पुकार सुनकर धरती माता प्रकट हुई। परंतु वे मुस्कुरा रही थी। यह देखकर हनुमान ने कहा, "मेरे प्रभु दुखी हैं और आप हंस रही हैं। कृपया उनके आंसू मुझे वापस दीजिए।"
धरती माता बोली, हे हनुमान, यह मेरा सौभाग्य है कि प्रभु राम के पवित्र अश्रु मुझ पर गिरे हैं। मैं इन्हें वापस नहीं दे सकती।
यह सुनकर हनुमान अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने भयंकर पंचमुखी नरसिंह रूप धारण कर लिया और क्रोध में आकर पृथ्वी पर उत्पात मचाने लगे। वे वृक्षों, पर्वतों और नदियों को उखाड़ उखाड़ कर फेंकने लगे।
समस्त देवता भयभीत होकर महादेव के पास पहुंचे। तभी हनुमान देव के समक्ष प्रकट हुए और बोले, "मुझे आपके मस्तक पर सुशोभित चंद्रमा दे दीजिए। मैं इसे सदा के लिए दूर कर दूंगा।"
महादेव ने शांत स्वर में कहा, हे पुत्र ऐसा करने से सृष्टि में अनर्थ हो जाएगा। परंतु क्रोधित हनुमान ने उनकी बात नहीं मानी और चंद्रमा को पकड़ने का प्रयास किया।
तब महादेव अत्यंत रुष्ट होकर तांडव करने लगे। यह देखकर माता पार्वती ने महादेव के चरण पकड़ लिए और करुण स्वर में बोली, हे प्रभु, यह भी आपका ही पुत्र है। कृपया इसे क्षमा कर दीजिए।
माता पार्वती की विनती सुनकर महादेव का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने हनुमान को भी शांत कर दिया।
कुछ समय बाद हनुमान बोले मां मुझे अत्यंत प्यास लगी है। तब माता पार्वती ने अपने करुणामय स्पर्श से धरती से मधुर जल प्रवाहित किया। हनुमान ने वह जल पिया और बोले मैंने इतना मधुर जल पहले कभी नहीं पिया।
तब महादेव ने कहा हे हनुमान यह वही पवित्र जल है जो तुम्हारे प्रभु राम के अश्रुओं से उत्पन्न हुआ है। यह समस्त सृष्टि के लिए अमृत के समान है जिसे देवता, मनुष्य और सभी जीव-जंतु ग्रहण करेंगे। यह सुनकर हनुमान महादेव के पांव पड़कर रोने लगे।
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