महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कुरुक्षेत्र की धरती लाखों वीरों के रक्त से लाल हो चुकी थी। भीष्म, द्रोण, कर्ण, दुर्योधन और एक-एक करके समस्त कौरव वीर काल के मुख में समा चुके थे। कौरवों की विशाल सेना मिट चुकी थी। उस महाविनाश के बाद यदि कोई सबसे बड़ा षड्यंत्रकारी जीवित बचा था, तो वह था गांधार का राजकुमार मामा शकुनि। जिसने वर्षों तक अपनी चतुराई, कपट और मायावी बुद्धि से पूरे हस्तिनापुर को विनाश की ओर धकेला था।
शकुनि जानता था कि अब उसके बचने का कोई मार्ग नहीं है। उसे यह भी ज्ञात था कि उसके सारे षड्यंत्र समाप्त हो चुके हैं और उसका अंत निश्चित है। लेकिन जीवन की अंतिम घड़ी में भी उसके भीतर का अहंकार शांत नहीं हुआ। उसने सोचा कि यदि युद्ध में नहीं जीत सका, तो अंतिम बार अपने सबसे बड़े अस्त्र, पासों के बल पर विजय प्राप्त कर लूँ। वही पासे जिनके बारे में कहा जाता था कि वे उसके संकेत पर मनचाही संख्या दिखाते थे। क्योंकि वे साधारण पासे नहीं थे, बल्कि उसके पिता की अस्थियों से बने हुए थे, जिनमें प्रतिशोध की अग्नि और श्राप की शक्ति समाई हुई थी।
एक दिन शकुनि स्वयं श्री कृष्ण के पास पहुँचा। उसके चेहरे पर पराजय का दुख नहीं, बल्कि एक विचित्र मुस्कान थी। उसने हाथ जोड़कर कहा कि वासुदेव! आपने युद्ध जीत लिया, लेकिन क्या आप मेरे साथ एक अंतिम खेल खेलने का साहस करेंगे? यदि मैं हार गया तो स्वयं अग्नि में प्रवेश कर अपने जीवन का अंत कर दूँगा। लेकिन यदि आप हार गए, तो आपको भी मेरी शर्त स्वीकार करनी होगी।
वहाँ उपस्थित सभी लोग स्तब्ध रह गए। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि एक साधारण मनुष्य स्वयं भगवान श्री कृष्ण को चुनौती दे रहा है। सभी की दृष्टि श्री कृष्ण पर टिक गई। प्रभु मुस्कुराए। उनके चेहरे पर न क्रोध था, न आश्चर्य। वे जानते थे कि यह केवल एक खेल नहीं, बल्कि संसार को एक अंतिम शिक्षा देने का समय है। उन्होंने शांत स्वर में कहा, यदि तुम्हारी यही इच्छा है, तो खेल आरंभ हो।
शकुनि ने अपने प्रिय पासों को दोनों हाथों में उठाया। उसने आँखें बंद कीं और मन ही मन अपनी मायावी शक्तियों का स्मरण किया। उसे पूरा विश्वास था कि आज भी उसके पासे वही करेंगे जो वह चाहेगा। उसने पहला दाँव फेंका। पासे भूमि पर गिरे और ठीक वही अंक सामने आए जिनकी उसने कामना की थी। शकुनि के चेहरे पर विजय की मुस्कान फैल गई। उसे लगा कि उसके पासों की शक्ति आज भी अटूट है।
फिर बारी आई श्री कृष्ण की। प्रभु ने पासों को हाथ तक नहीं लगाया। उन्होंने केवल एक शांत दृष्टि उन पासों पर डाली। अगले ही क्षण एक अद्भुत घटना घटी। जो अंक अभी कुछ क्षण पहले दिखाई दे रहे थे, वे स्वयं बदलने लगे। पासे बिना किसी स्पर्श के पलट गए और परिणाम पूरी तरह बदल गया। शकुनि की आँखें विस्मय से फैल गईं। उसने घबराकर फिर पासे उठाए और दोबारा फेंके। इस बार भी वही हुआ। जैसे ही श्री कृष्ण ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा, पासों ने उसकी आज्ञा मानने से इनकार कर दिया।
अब शकुनि का आत्मविश्वास टूटने लगा। उसने क्रोध में कहा, यह असंभव है! ये पासे कभी मेरा साथ नहीं छोड़ सकते। इन्होंने आज तक मुझे धोखा नहीं दिया।
श्री कृष्ण ने शांत स्वर में उत्तर दिया, शकुनि, ये पासे तुम्हारे नहीं, केवल समय के साथ थे। जब तक अधर्म को अपना परिणाम देना था, तब तक इन्होंने तुम्हारा साथ दिया। लेकिन जहाँ स्वयं धर्म उपस्थित हो, वहाँ छल की कोई शक्ति नहीं चलती। माया तभी तक प्रभावी रहती है, जब तक सत्य सामने न आ जाए।
इतना कहकर श्री कृष्ण ने उन श्रापित पासों को अपनी हथेली में उठा लिया। देखते ही देखते वे दिव्य प्रकाश से भर उठे। अगले ही क्षण वे राख बनकर हवा में बिखर गए। जिन पासों के सहारे शकुनि ने एक पूरे राजवंश का विनाश रचा था, वे स्वयं भगवान के स्पर्श से अपना अस्तित्व खो बैठे। उस क्षण देवताओं ने भी आकाश से यह अद्भुत दृश्य देखा और समझ लिया कि ईश्वर के सामने संसार की सबसे बड़ी माया भी क्षण भर नहीं टिक सकती।
शकुनि घुटनों के बल बैठ गया। अब उसके पास न कोई छल बचा था, न कोई दाँव। उसने पहली बार समझा कि मनुष्य अपनी बुद्धि से लोगों को धोखा दे सकता है, लेकिन ईश्वर को कभी नहीं। जो स्वयं काल के भी स्वामी हैं, उनके सामने भाग्य बदलने वाले पासे भी असहाय हो जाते हैं।
यह प्रसंग हमें यही शिक्षा देता है कि छल, कपट और अहंकार कुछ समय के लिए सफलता का भ्रम दे सकते हैं, लेकिन अंततः विजय हमेशा सत्य, धर्म और ईश्वर की ही होती है। संसार की हर माया एक दिन समाप्त हो जाती है, पर भगवान की लीला और उनका न्याय सदा अटल रहता है।
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