महाप्रभु जगन्नाथ जी उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे और उन्हें अपार प्रेम करते थे। धीरे-धीरे समय बीता और रामदास वृद्ध होने लगे...


बंगाल में एक भक्त रहते थे रामदास। उनका नियम था कि हर एकादशी पर वे पैदल बंगाल से जगन्नाथ पुरी जाया करते थे। वहां जाकर वे सुबह समुद्र में स्नान करते, महाप्रसाद पाते और फिर रात को सयन आरती के बाद मंदिर के बाहर बैठकर कीर्तन करते।

महाप्रभु जगन्नाथ जी उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे और उन्हें अपार प्रेम करते थे। धीरे-धीरे समय बीता और रामदास वृद्ध होने लगे। अब उनके शरीर में पहले जैसा बल नहीं रहा लेकिन उन्होंने अपना नियम नहीं छोड़ा। उनका मन अब भी वही था। भक्ति में अटल महाप्रभु जगन्नाथ जी को उस पर दया आ गई।

जब अगली एकादशी पर रामदास पुरी पहुंचे और कीर्तन कर रहे थे। उन्होंने नेत्र बंद किए हुए प्रभु का ध्यान लगाया। तभी उनके ध्यान में जगन्नाथ जी प्रकट हुए और बोले रामदास तू अब पूरी मत आया कर मुझे बड़ा कष्ट होता है।

रामदास बोले महाप्रभु आपको कष्ट होता है इसलिए मैं समझता हूं कि अब आना ठीक नहीं। पर यदि अगली एकादशी को आप मेरे सामने नहीं होंगे तो मेरे प्राण ही निकल जाएंगे नाथ।

जगन्नाथ जी बोले ठीक है तो एक काम तो किया जा सकता है जिससे तुझे पूरी भी ना आना पड़े और तू मेरा दर्शन भी कर ले।

रामदास बोले वो कैसे संभव है?

जगन्नाथ जी बोले अगली एकादशी में जब पूरी आएगा तो एक बैलगाड़ी ले आना। मैं भी तेरे साथ चलूंगा तेरे घर। तब मेरा दर्शन कर लेना। प्रेम से दिन भर मुझे ही देखता रहना। मैं तुझे देखता रहूंगा।

रामदास बोले अरे नहीं महाप्रभु आप तो सुख से विराजो मैं आ जाऊंगा मुझे कोई कष्ट नहीं होगा

लेकिन जगन्नाथ जी बोले अब तो हमने मन बना लिया है मैं तो तुम्हारे साथ ही जाऊंगा और वह भी अगली एकादशी पर रामदास खुश भी हुए और दुखी भी

अगली एकादशी जब आई तो रामदास बैलगाड़ी में बैठकर आए सब पंडा पुजारी बोले अरे रामदास आज बैलगाड़ी से आए हो कुछ विशेष है क्या?

रामदास बोले नहीं नहीं बूढ़े हो गए हैं ना इसलिए…

रात का समय था सयन आरती हो चुकी थी रामदास बैठे थे प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब आएंगे तभी क्या देखते हैं पीतांबरी पहनकर सिर पर मोर पंख लगाकर साक्षात महाप्रभु जगन्नाथ मंदिर से बाहर आ रहे हैं और ऐसे ही नहीं आ रहे अपने सब अंग वस्त्र एक पोटली में बांधकर रामदास के समीप आ रहे हैं।

रामदास ने कहा फिर सोच लो चलना है कि रुकना है तो जगन्नाथ जी ने कहा अब तो तय हो चुका है कि चलेंगे हम तुम्हारे संग ही

रामदास मन में सोच रहे थे मैं तो मना कर रहा हूं पर इन्हें ही आना है मेरे साथ जब बैलगाड़ी के पास गए तो जगन्नाथ जी बोले ये बैल तो बूढ़े हैं। मैं अगर त्रिलोक का भार लेकर बैठा तो यह यहीं से बैकुंठ चले जाएंगे।

भोले रामदास बोले अब तो यही मिला मुझे इसी से काम चला लो।

जगन्नाथ जी ने कहा ठीक है। जैसे ही उन्होंने हाथ फेरा बैलों के ऊपर वैसे ही दोनों बैल तंदुरुस्त हो गए। जगन्नाथ जी बोले हटो हम चलाते हैं। यह हमारी काम की है।

रामदास बोले मैं ही चला लूंगा। आप छोड़ो।

जगन्नाथ जी बोले नहीं मैं ही चलाऊंगा। सामने बैल हाकते हुए द्वारकाधीश थे और पीछे सीधे-साधे रामदास बैठे थे।

जैसे ही मंगला आरती का समय हुआ वैसे ही सब पुजारी बोले यह सुभद्रा जी और बलभद्र जी तो हैं पर जगन्नाथ जी कहां गए?

सब जगह हल्ला मच गया। जगन्नाथ जी चोरी हो गए। ढूंढो। सबका शक गया रामदास के ऊपर क्योंकि रामदास ही वहां रात भर रहते थे। जगन्नाथ जी को पता चल गया था कि सब पंडा पुजारी रामदास के पास आ रहे हैं। वो अभी पूरी की सीमा से बाहर नहीं गए थे।

तो जगन्नाथ जी ने कहा रामदास तुम मुझे कहीं छिपा दो। सब पंडा पुजारी आ रहे हैं तुम्हारे पास।

पास में ही एक तालाब था। उसके पीछे एक गुफा जैसी बनी थी। तो रामदास ने जगन्नाथ जी को वहीं छिपा दिया। लेकिन उनकी पीतांबरी का एक कोना बैलगाड़ी में रह गया।

सब पंडा पुजारी आए और उनकी तलाशी लेने लगे। तभी वह पीतांबरी का छोर उन्हें दिख गया और बिना कुछ पूछे मारपीट शुरू कर दी। तभी तालाब से आवाज आई। अरे मूर्खों तुम्हें क्या लगता है? मुझे कोई अपनी मर्जी से ले जा सकता है? नहीं, मैं स्वयं चलकर आया हूं।

तभी क्या देखा? जगन्नाथ जी के श्रींग से रक्त बह रहा है और पूरा तालाब रक्त मंदित हो गया है। सब बोले क्षमा कर दो महाप्रभु

महाप्रभु बोले क्षमा नहीं मिलेगी जाओ मेरे भक्त को मारते हो शर्म नहीं आती और जगन्नाथ जी रामदास के साथ चले गए। कुछ दिन बाद सब फिर से आए और बोले महाप्रभु हमारी रोजी रोटी कैसे जलेगी? अब आप तो चले आए हमारा पेट कैसे भलेगा?

जगन्नाथ जी ने कहा यही अंतर है मेरे भक्त में और बगुला भक्तों में फिर बोले ठीक है हम अपने भार के बराबर तुम लोगों को सोना दे देते हैं तो हो जाएगा ना सब बोले जगन्नाथ जी भारी तो खूब हैं बहुत सोना मिलेगा सब बोले ठीक है

जगन्नाथ जी बोले रामदास व्यवस्था करो रामदास बोले यह गलत है मेरे पास इतना कुछ है ही नहीं देने को मैं कहां से लाऊंगा इतना सोना

जगन्नाथ जी बोले तुम्हारी पत्नी की नाक पर एक सोने का किल है वो ले आओ और एक तुलसी का पत्ता ले आओ बाकी हम दिखाते है

जैसे ही नापा गया तो उस किल से भी कम भार के महाप्रभु हो गए और सब पंडा [संगीत] पुजारी से बोले जाओ ले लो अपनी जिंदगी धन चाहिए ना तुम्हें अब उन पुजारियों के पास कुछ कहने का मुंह ना रहा वे सब पंडा पुजारी खाली हाथ पूरी लौट आए भगवान भगवान को कोई बांध नहीं सकता। पर प्रेम के वश में आकर वे स्वयं बंध जाते हैं। जय जगन्नाथ।

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