यह घटना आज से ठीक एक वर्ष पूर्व की है। हमारे भवन में नीचे की मंजिल पर जो दीदी रहती हैं, यह भयानक कांड उनके पैतृक निवास, चंदौली जिले के एक गाँव में घटित हुआ था। यह बात उनके सगे अनुज की नहीं, बल्कि उनके चचेरे भाई की है।
उनका परिवार बचपन में अत्यधिक निर्धनता से जूझ रहा था। स्थिति इतनी दयनीय थी कि वे एक-एक कौड़ी के लिए तरसते थे। परंतु जब वह लड़का बड़ा हुआ और उसकी आयु लगभग बीस से इक्कीस वर्ष की हुई, तब उसकी किस्मत ने ऐसी पलटी मारी कि उसकी मेहनत रंग लाई। उसे कुछ ऐसा कार्य मिला कि रातों-रात उसके पास झोले भर-भरकर धन आने लगा। धनवान बनते ही उस लड़के ने सबसे पहले अपनी परोपकारी सोच का परिचय दिया। उसने अपनी बहन को उच्च शिक्षा दिलाई, गाँव में एक अत्यंत भव्य और सुंदर भवन का निर्माण करवाया। जब उसने अपने परिवार की सारी जिम्मेदारियां पूरी कर लीं, तब उसने पूरे गाँव की भलाई के लिए हाथ आगे बढ़ाया। वह गाँव की निर्धन कन्याओं को अच्छे विद्यालयों में पढ़ाता था, किसी को दुपहिया वाहन दिलाता, तो किसी निर्धन बहन के विवाह का पूरा खर्च स्वयं उठाता था। देखते ही देखते, पूरा गाँव उसे अपने मुखिया की तरह आदर और सम्मान देने लगा।
परंतु, कहते हैं ना कि भलाई के पीछे हमेशा एक काली परछाई भी चलती है। उस गाँव में एक ऐसी कुटिल स्त्री भी थी, जिसे इस लड़के की यह अपार सफलता, प्रसिद्धि और परोपकार बिल्कुल भी रास नहीं आ रहा था। उसके मन में भीतर ही भीतर ईर्ष्या की एक भयानक आग सुलग रही थी। वह लड़का इतना समृद्ध होने के बाद भी ज़मीन से जुड़ा हुआ था। उसके मन में रत्ती भर भी अहंकार नहीं था। वह गाँव में सबके घर जाता था, मिलनसार था और सभी कन्याएँ उसे आदर से भैया कहती थीं। वह उनका इतना ध्यान रखता था कि उन्हें मेलों में भी ले जाता था ताकि किसी को यह न लगे कि धन आने के बाद वह बदल गया है।
परंतु, वही सामने रहने वाली कुटिल स्त्री, जिसे उससे ईर्ष्या थी, उसने एक सोची-समझी साज़िश रची। उसने बड़े ही कपट और झूठे प्रेम से उसे अपने घर दावत पर बुलाया। पहले जल पिलाया, फिर बर्फी दी और भोजन में मांस परोसा। भोजन ग्रहण करने के पश्चात जब वह अपने गृह वापस आया, तो ठीक तीन से चार दिन बाद उसे अपने भीतर अत्यंत विचित्र और अस्वाभाविक परिवर्तन अनुभव होने लगे। वह रात्रि के अंधकार में इस सीमा तक भयभीत होने लगा कि उसकी आँखों से निद्रा पूरी तरह गायब हो गई। उसके स्वप्नों में अत्यंत भयावह और खौफनाक दृश्य दिखाई देने लगे। कभी उसे प्रतीत होता कि कोई उसे प्राणों से मारने के लिए दौड़ा रहा है, तो कभी कोई अदृश्य शक्ति उसका गला घोंटने का प्रयास करती थी। वह मध्य रात्रि में भय के मारे पसीने-पसीने होकर जाग जाता था।
जब स्थिति असहनीय हो गई, तो उसने अपने परिवार के सदस्यों से अपनी इस व्यथा को साझा किया। उसने अपनी माता और भाइयों को सब कुछ सच-सच बताया। परंतु, विडंबना यह थी कि गृह के लोगों ने उसकी इस गंभीर स्थिति को अत्यंत हल्के में लिया। उनका मानना था कि वह दिनभर अत्यधिक कार्य करता है, जिसके कारण वह थक जाता है और इसी मानसिक थकान की वजह से... परिवार का कोई भी सदस्य उसकी इन बातों पर रत्ती भर भी विश्वास करने को उद्यत नहीं था। उस गृह में रहने वाली दो बेटियाँ और एक छोटा बालक (जो रिश्ते में भानजा लगता था), जब भी वह उनसे अपने इस डर की चर्चा करता, तो वे सभी उसकी बात को कोरी कल्पना समझकर हँसने लगते थे। कोई भी यह भांप नहीं पा रहा था कि उस मासूम लड़के के साथ परछाइयों का एक अत्यंत भयानक खेल शुरू हो चुका है।
समय बीतता गया और ठीक एक महीने के पश्चात उस लड़के की शारीरिक और मानसिक स्थिति इतनी बदतर हो गई कि वह बिस्तर से उठकर दो कदम चलने के योग्य भी नहीं रहा। परिवार के लोगों ने उसकी आत्म-संतुष्टि के लिए आस-पास के कई वैद्यों और चिकित्सकों को दिखाया। परंतु, आधुनिक चिकित्सा के यंत्रों और जांच में सब कुछ सामान्य निकल रहा था। चिकित्सक केवल यही कह रहे थे कि यह एक साधारण ज्वर है जो विश्राम करने से ठीक हो जाएगा। परंतु उस लड़के की आत्मा भीतर ही भीतर घुट रही थी, उसका मन इस बात को स्वीकार करने के लिए कतई तैयार नहीं था।
जब स्थिति जीवन और मृत्यु के मोड़ पर आ खड़ी हुई, तब थक-हारकर परिवार के लोग उसे गाजीपुर के एक अत्यंत विख्यात और सिद्ध तांत्रिक के पास लेकर गए। उस सिद्ध पुरुष ने जैसे ही उस मरणासन्न लड़के की नाड़ी छुई और अपनी दिव्य दृष्टि से देखा, उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। तांत्रिक ने अत्यंत गंभीर स्वर में कहा, "तुम लोग इसे बहुत देर से लेकर आए हो। इसकी आयु का अंतिम क्षण आ चुका है। यह केवल आज ही के दिन का मेहमान है, आज रात्रि के पश्चात इसके प्राण पखेरू उड़ जाएंगे।" यह सुनते ही परिवार के ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। इसके पश्चात उस तांत्रिक ने उस लड़के के प्राणों की रक्षा के लिए उसे तुरंत तीन अत्यंत शक्तिशाली रक्षा-कवच दिए।
सिद्ध तांत्रिक ने उन तीन रक्षा-कवचों को देते हुए अत्यंत कड़े शब्दों में चेतावनी दी, "यदि तुमने इन तीनों रक्षा-कवचों को नियत समय पर इस लड़के को नहीं पहनाया, तो काल इसके प्राण हर ले जाएगा। इसके प्राणों की रक्षा का केवल यही एकमात्र उपाय है।" इसके पश्चात तांत्रिक ने उस काले रहस्य से पर्दा उठाते हुए कहा, "तुम्हारे भवन के ठीक सामने रहने वाली तुम्हारी ही एक पड़ोसन ने इसके साथ यह घोर तांत्रिक प्रपंच किया है। उसी कुटिल स्त्री ने अत्यंत तीव्र मारण मंत्रों से अभिमंत्रित करके इसे जल, बर्फी और मांस खिलाया था। उसने तंत्र विद्या के बल पर इसे मृत्यु के घाट उतारने के लिए केवल आज ही की रात्रि का अंतिम समय निश्चित किया है।" यह सुनते ही परिवार के लोगों के होश उड़ गए। तांत्रिक ने स्पष्ट निर्देश दिया कि इन तीन रक्षा-कवचों को काल के भिन्न-भिन्न प्रहरों में पहनाना होगा—प्रथम रक्षा-कवच रात्रि ठीक दस बजे, द्वितीय मध्य रात्रि दो बजे और तृतीय अत्यंत संकटपूर्ण प्रहर रात्रि तीन बजे। यह उस परोपकारी लड़के की जिंदगी और मौत के बीच की अंतिम और सबसे भयानक रात होने वाली थी, जहाँ समय की एक पल की भी चूक सीधे उसकी जान ले सकती थी।
रात्रि के ठीक दस बजे, प्रथम निर्देशानुसार परिवार ने उस मरणासन्न लड़के के गले में पहला रक्षा-कवच पहना दिया। यह प्रथम कवच केवल एक सामान्य सुरक्षा घेरा था, असली परीक्षा तो मध्य रात्रि दो बजे और तीन बजे के संकटपूर्ण प्रहर में होने वाली थी। पहला कवच पहनाते ही, उस लड़के के शरीर में एक अत्यंत अस्वाभाविक हलचल शुरू हो गई। उसे तीव्र बेचैनी होने लगी, उसका जी घबराने लगा और उसका पूरा शरीर खौलते हुए ज्वर से तपने लगा। लड़के की ऐसी विकट स्थिति देखकर पूरा परिवार थर-थर कांपने लगा। स्थिति हाथ से निकलती देख, उन्होंने तुरंत एक रोगी-वाहन का प्रबंध किया ताकि उसे वापस उस सिद्ध तांत्रिक या किसी बड़े चिकित्सालय ले जाया जा सके। उस रोगी-वाहन के भीतर पूरा परिवार अत्यंत सतर्क अवस्था में बैठा हुआ था। वाहन की संकरी जगह में सभी एक-दूसरे के अत्यंत समीप थे और लड़के की पल-पल की स्थिति पर नज़र रखे हुए थे। समय अत्यंत तेज़ी से मध्य रात्रि के खौफनाक प्रहर यानी दो बजे की ओर बढ़ रहा था, जहाँ दूसरा सबसे महत्वपूर्ण रक्षा-कवच पहनाया जाना था।
परंतु, तभी उस वाहन के भीतर कुछ ऐसा घटित हुआ जो मानव बुद्धि से परे है। अचानक पूरे परिवार को एक ऐसी भयानक और सम्मोहक निद्रा ने अपनी आगोश में ले लिया, जिसका प्रतिरोध करना किसी के बस में नहीं था। उस वाहन में बैठा एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं बचा जो अपनी आँखें खुली रख सके। उस अदृश्य तांत्रिक परछाई ने पूरे परिवार की चेतना को पूरी तरह शून्य कर दिया था। लगभग बीस से पच्चीस मिनट के पश्चात, जब परिवार के सदस्यों की निद्रा अचानक टूटी, तो वाहन के भीतर सन्नाटा पसरा हुआ था। ठीक दो और तीन बजे के उस मुख्य तांत्रिक प्रहर के बीच, जब काल का अंतिम प्रहार हुआ, तब रक्षा-कवच पहनाने वाला कोई जाग नहीं रहा था। जब माता ने कांपते हाथों से अपने जीवन और कुल के उस दीपक को छुआ, तो उसका शरीर बर्फ की भांति ठंडा पड़ चुका था। वह परोपकारी, निष्पाप लड़का उस घोर तांत्रिक स्त्री के कुटिल प्रपंच के आगे अपनी जिंदगी की जंग हार चुका था और मौन विलाप करते परिवार के बीच हमेशा के लिए अपनी आँखें मूंद चुका था।
उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया। अग्नि की लपटों के साथ गाँव का वह मसीहा पंचतत्व में विलीन हो गया। परंतु, उसके पीछे छूटा उसका परिवार पूरी तरह से टूटकर बिखर गया। वह लड़का ही उस गृह का एकमात्र सहारा और आजीविका चलाने वाला था। उसके जाते ही उस भव्य भवन में सन्नाटा पसर गया और उस अभागे परिवार की आर्थिक स्थिति पुनः पहले की भांति अत्यंत दयनीय और निर्धन हो गई। गृह में दो युवा बहनें थीं, जिनका भविष्य अब अंधकारमय हो चुका था। वह छोटा भानजा, जो हर क्षण अपने मामा की उंगली पकड़े खेलता-कूदता रहता था, उसका मन भी अब किसी कार्य में नहीं लगता था। पूरे गृह में अन्न का एक दाना ग्रहण करने वाला कोई नहीं बचा था। उस अभागिनी वृद्ध माता की स्थिति तो इतनी भयावह हो चुकी थी कि उसके विलाप और क्रंदन को सुनकर साक्षात पत्थरों का कालेजा भी फट जाए।
परंतु, इस भयानक कांड का सबसे अंतिम और रोंगटे खड़े कर देने वाला अध्याय तो उसके अंतिम संस्कार के ठीक दो-चार दिन पश्चात आरंभ हुआ। अचानक उस मृत लड़के की सगी युवा बहन के भीतर कुछ अत्यंत विचित्र परिवर्तन दिखाई देने लगे। वह लड़की बिल्कुल उसी मृत भाई की भांति चलकर आने लगी, उसी के ढंग से अपने कार्यालय के बक्से को संभालने लगी। उसकी भाषा, उसकी शैली और उसकी आवाज़ पूरी तरह से बदल चुकी थी। अचानक उसकी आँखें अत्यधिक क्रोध में लाल हो गईं। जब परिवार के लोग भयभीत होकर उसे देखने लगे, तो उस छोटे भानजे ने कौतूहलवश कह दिया, "तुम बिल्कुल हमारे मामा की तरह क्यों व्यवहार कर रही हो?" इतना सुनते ही उस लड़की ने अत्यंत उग्र होकर पास रखे आलुओं को उठाकर उस बालक पर दे मारा। उसका पूरा बदन भीषण ज्वर से तपने लगा, परंतु उसकी चेतना पर उस मृत भाई का पूर्ण नियंत्रण हो चुका था। यह रहस्यमयी सिलसिला तीन से चार दिनों तक निरंतर चलता रहा।
अंततः एक दिन, वह लड़की अपनी रोती-बिलखती वृद्धा माता के सम्मुख आकर खड़ी हो गई। उसने ठीक उसी मृत बेटे की कर्कश और भयानक आवाज़ में चिल्ला-चिल्ला कर कहना आरंभ किया, "मुझे छल से मारा गया है! मैं स्वयं अपनी मृत्यु से नहीं मारा हूँ! मेरे साथ संसार का सबसे घोर अन्याय हुआ है! मैं जीना चाहता था, परंतु मुझे बलपूर्वक और षड्यंत्र रचकर मार डाला गया!"
यह देखकर उस व्याकुल, बिलखती हुई माता का कलेजा फट गया। रोते हुए माता ने अपनी बेटी के शरीर में बैठी उस आत्मा से पूछा, "बेटा, तू उस रात हमें छोड़कर कैसे चला गया? हम सब तो उस रोगी-वाहन में तेरे पास ही बैठे थे, तू उस समय जीवित था, फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि तेरे प्राण चले गए?"
माता की यह बात सुनते ही वह आत्मा उस लड़की के कंठ से अत्यंत चीखते हुए करुण विलाप करने लगी और बोली, "माता! जब तुम सब उस वाहन में अचानक एक भयानक तांत्रिक निद्रा में सो गए थे, तब काल ने मुझ पर अंतिम प्रहार किया था। उस तांत्रिक शक्ति ने मुझे रात के प्रहर में वे रक्षा-कवच (ताबीज) पहनने ही नहीं दिए! मैं संकट में था, मैं अपनी जान बचाने के लिए ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था, तुम्हें पुकार रहा था! मैं बहुत तड़पा, परंतु मेरी आवाज़ तुम तक पहुँच ही नहीं रही थी क्योंकि तुम सब गहरी चेतनाहीनता में थे। उसी अंधकार के बीच किसी अदृश्य परछाई ने आकर मेरा गला घोंट दिया! उसने इतनी तेज़ी और क्रूरता से मेरा गला दबाया कि मेरे प्राण निकल गए!"
इतना कहकर वह आत्मा अपनी वृद्धा माता के चरणों में गिर पड़ी और अपनी बहन के शरीर के माध्यम से बिलख-बिलख कर जीवन की भीख मांगने लगी। वह कांपती हुई आवाज़ में रोते हुए बोली, "माँ! मैं इस अधूरी मौत मरना नहीं चाहता! मेरा प्रतिशोध अभी बाकी है! माँ, प्लीज माँ! मेरे बड़े भ्राता (जो सेना में देश की रक्षा करते हैं), उनका विवाह शीघ्र से शीघ्र करवा दो! मैं अपनी उस आने वाली भाभी की कोख से उनका बेटा बनकर पुनः इस संसार में जन्म लूँगा! मैं वापस आऊँगा माँ, और उस कुटिल तांत्रिक औरत से अपनी अकाल मृत्यु का एक-एक पल का बदला पूरा करूँगा! माँ, मेरे भाई का विवाह करा दो..."
वह रूह आगे और भी तड़पते हुए अपनी माता से कहने लगी, "माँ, जब से मेरी मृत्यु हुई है, मैं भटक रहा हूँ। परलोक की दुनिया में भी मुझे कोई स्थान नहीं मिला है, वहाँ से भी मुझे भगा दिया गया है। वहाँ सब कह रहे हैं कि तुम्हारी आयु अभी शेष थी, तुम्हारा समय अभी पूरा नहीं हुआ था, तुम अकाल मृत्यु मरे हो। इसीलिए मैं इस समय अधर में, बाहर ही बैठा रहता हूँ। मेरा वहाँ कोई ठिकाना नहीं है माँ! मेरी इस भटकती हुई आत्मा को केवल तुम्हारे गृह में ही मुक्ति मिल सकती है। इसीलिए कह रहा हूँ माँ, मेरे भ्राता का विवाह शीघ्र करा दो ताकि मैं उनकी संतान बनकर वापस तुम्हारे आँगन में आ सकूँ और उस कुटिल औरत से अपना प्रतिशोध पूरा कर सकूँ..."
उस गूंजती हुई खौफनाक सच्चाई, बेटे की अंतिम तड़प और पुनर्जन्म की उस भयानक प्रतिज्ञा को सुनकर उस अभागिनी माता का दिल थर्रा उठा। उस चीख ने उस शांत भवन के भीतर साक्षात काल के उस खौफनाक सच को उजागर कर दिया, जिसे सुनकर पूरे परिवार के रोंगटे खड़े हो गए। परछाइयों और तंत्र विद्या का वह काला खेल आज भी उस अभागे परिवार के आँगन में गूंज रहा है...
पाठकों के लिए एक अत्यंत आवश्यक और सत्य संदेश:
यह कोई काल्पनिक या मनगढ़ंत कहानी नहीं है, बल्कि मेरे अपने ही भवन की दूसरी मंजिल पर रहने वाली दीदी के परिवार के साथ घटी साक्षात और प्रामाणिक घटना है. जब वे रोते हुए अपने भाई की यह व्यथा सुना रही थीं, तो उनकी आँखों के आँसू और उस डर को देखकर मेरा भी कलेजा कांप उठा था. तंत्र विद्या और अदृश्य परछाइयों का यह खौफनाक सच हमारी आँखों के सामने घटित हुआ है, जो हमें यह सोचने पर विवश करता है कि अपने आस-पास के लोगों से सचेत रहना कितना अनिवार्य है.
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