एक बार माता लक्ष्मी ने वैकुण्ठ के द्वार पर भगवान विष्णु से दृढ़ स्वर में कहा कि प्रभु जब तक पृथ्वी पर आपका एक भक्त जीवन और मृत्यु के बीच तड़प रहा है, तब तक आप वैकुण्ठ में प्रवेश नहीं करेंगे।
उस समय पृथ्वी पर भीषण अकाल पड़ा था। खेत सूख चुके थे, नदियाँ खाली थीं और लोग भूख-प्यास से व्याकुल थे। उसी समय हरिदास नाम का एक वृद्ध भक्त अपनी छोटी-सी झोपड़ी में बिना अन्न और जल के भी केवल नारायण का नाम जप रहा था। उसने कभी किसी का बुरा नहीं किया और जीवन भर भगवान पर अटूट विश्वास बनाए रखा।
भगवान विष्णु जानते थे कि यह उसके पूर्व कर्मों का फल है, इसलिए वे सृष्टि के न्याय का पालन कर रहे थे। लेकिन माता लक्ष्मी का हृदय दया से भर उठा। उन्होंने कहा कि प्रभु, न्याय आवश्यक है, पर सच्चे भक्त को उसकी पीड़ा में अकेला नहीं छोड़ा जा सकता।
माता लक्ष्मी के आग्रह पर भगवान विष्णु एक साधारण यात्री का रूप धारण कर पृथ्वी पर पहुँचे। वे हरिदास की झोपड़ी में गए, अपने हाथों से उसे भोजन कराया और प्रेमपूर्वक उसका दुःख बाँटा। हरिदास ने उनके स्पर्श में दिव्यता का अनुभव किया। तभी भगवान अपने चतुर्भुज स्वरूप में प्रकट हुए और उसे हृदय से लगा लिया।
भगवान ने कहा कि वत्स, कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ता है, पर निष्काम भक्ति मुझे अपने भक्त के पास आने के लिए विवश कर देती है। मैं नियम नहीं तोड़ता, लेकिन अपने भक्त को कभी अकेला भी नहीं छोड़ता।
उसी क्षण वर्षा होने लगी, सूखी धरती हरी-भरी हो गई और पूरे गाँव में जीवन लौट आया। वैकुण्ठ वापस आने पर माता लक्ष्मी ने मुस्कुराकर कहा कि आज आपने सिद्ध कर दिया कि न्याय सृष्टि को चलाता है, लेकिन करुणा उसे सुंदर बनाती है।
इस कथा से यह संदेश मिलता है कि सच्ची भक्ति केवल पूजा में नहीं, बल्कि दया, सेवा और करुणा में है। जो दूसरों के आँसू पोंछता है, भगवान स्वयं उसके जीवन में किसी न किसी रूप में अवश्य आते हैं।
जय लक्ष्मी नारायण
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