ओडिशा की पवित्र भूमि, जहाँ की वायु में भी *'जय जगन्नाथ'* की ध्वनि गूंजती है, वहाँ विश्वनाथ नाम का एक निर्धन ब्राह्मण रहता था। उसके पास न धन था, न रहने को महल और न ही कोई सांसारिक सहारा। यदि कुछ था, तो वह था—**भगवान जगन्नाथ के प्रति उसका अटूट और निश्छल प्रेम।** वह प्रतिदिन मंदिर के सिंहद्वार पर बैठता, अपनी फटी हुई झांझ बजाता और अश्रुपूर्ण नेत्रों से गाता:
*"प्रभु! मेरे पास आपको अर्पित करने के लिए छप्पन भोग नहीं, केवल इस दीन का प्रेम और अटूट विश्वास है।"*
### उपहास और अटूट विश्वास
विश्वनाथ की दरिद्रता इतनी थी कि कई बार उसके घर में अन्न का एक दाना तक नहीं होता था। संसार का तो नियम ही है—उगते सूरज को सलाम करना और ढलते को देख मुस्कुराना। लोग उसका मज़ाक उड़ाते और कहते, *"इतनी भक्ति का क्या लाभ? अगर तुम्हारे जगन्नाथ सच में सुनते हैं, तो तुम्हें भूखा क्यों रखते हैं?"*
विश्वनाथ बस मुस्कुरा देता और कहता, *"मेरे प्रभु की मर्जी। वह मुझे भूखा उठा सकते हैं, पर भूखा सुलाते नहीं। परीक्षा उनकी है, तो पार भी वही लगाएंगे।"*
### अहंकार का प्रहार
एक समय ऐसा आया जब लगातार तीन दिनों तक विश्वनाथ को अन्न की एक कौड़ी भी नसीब नहीं हुई। भूख से उसका शरीर अत्यंत दुर्बल हो चुका था, फिर भी वह मंदिर के सामने बैठा प्रभु के ध्यान में लीन था।
उसी समय, राज्य के राजा का भव्य जुलूस वहाँ से गुजरा। हाथियों की चिंघाड़ और नगाड़ों की गूंज के बीच राजा की दृष्टि उस फटेहाल ब्राह्मण पर पड़ी। अहंकार में डूबे राजा ने त्योरियां चढ़ाकर कहा, *"इस दरिद्र भिखारी को यहाँ से हटाओ! यह मेरी राजकीय यात्रा में अपशकुन पैदा कर रहा है।"*
राजा का आदेश पाते ही सैनिकों ने विश्वनाथ को बेरहमी से घसीटा, लाठियों से पीटा और मंदिर के प्रांगण से दूर फेंक दिया। उसके शरीर से रक्त बह रहा था, धूल से वह सना हुआ था, किंतु उसके कांपते होंठों पर अब भी केवल एक ही नाम था— **"जय जगन्नाथ... जय जगन्नाथ..."**
### गर्भगृह से न्याय का चक्र
संसार ने तो इस दृश्य को देखकर आँखें मूंद लीं, पर नीलाचल धाम के गर्भगृह में बैठे **चतुर्धा मूरति (भगवान जगन्नाथ)** का सिंहासन डोल उठा।
उसी रात्रि, राजमहल के भीतर राजा के शरीर में अचानक ऐसी असहनीय पीड़ा उठी, मानो सैकड़ों बिच्छुओं ने एक साथ डंक मार दिया हो। बड़े-बड़े राजवैद्य बुलाए गए, जड़ी-बूटियाँ दी गईं, तंत्र-मंत्र और यज्ञ हुए, पर राजा की तड़प कम न हुई।
आधी रात को दर्द से बेहाल राजा की थोड़ी सी आँख लगी, तो उसने स्वप्न में साक्षात ब्रह्मांड के स्वामी भगवान जगन्नाथ को देखा। प्रभु का सौम्य मुख आज अत्यंत क्रोधित था। प्रभु ने गर्जना करते हुए कहा:
> *"मूर्ख राजन! जिस भक्त को तूने धूल में घसीटा, वह मेरे हृदय का हार है। तूने उसका नहीं, साक्षात मेरा अपमान किया है। मेरे भक्त के शरीर से गिरे रक्त की हर एक बूंद, तेरे साम्राज्य के पतन का कारण बनेगी!"*
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### राजा का पश्चाताप और शरणगति
भय से काँपता हुआ राजा थर-थर रोने लगा और बोला, *"प्रभु! अज्ञानतावश मुझसे भयंकर भूल हो गई। मुझे क्षमा कर दें, मेरी पीड़ा का अंत करें।"*
भगवान ने रुष्ट स्वर में कहा, *"तेरी इस पीड़ा की औषधि मेरे पास नहीं है। क्षमा तब तक नहीं मिलेगी, जब तक मेरा वह भक्त तुम्हें क्षमा न कर दे। जाओ, उसके चरणों में गिरकर अपने अहंकार की भीख मांगो।"*
सुबह की पहली किरण फूटते ही, राजा अपना राजसी मुकुट त्यागकर, नंगे पैर तड़पते हुए विश्वनाथ को ढूंढने निकला। उसने देखा कि मंदिर के पीछे एक पेड़ की छांव में घायल विश्वनाथ अब भी प्रभु की भक्ति में लीन था।
राजा तुरंत उसके चरणों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा, *"हे महाभाग! मुझे क्षमा कर दो। मेरे अहंकार ने मुझे अंधा कर दिया था।"*
विश्वनाथ ने अत्यंत शांत और करुणाभरे भाव से राजा को उठाया और कहा, *"राजन! उठिए। क्षमा करने वाला मैं तुच्छ मनुष्य कौन होता हूँ? सब मेरे जगन्नाथ जी की लीला है। यदि प्रभु की इच्छा होगी, तो आपकी पीड़ा अवश्य दूर होगी। बस इतना ध्यान रखिएगा कि किसी निर्धन की लाचारी का उपहास कभी मत उड़ाना।"*
### चमत्कार और सीख
विश्वनाथ के मुख से ये शब्द निकलते ही, राजा की सारी शारीरिक और मानसिक पीड़ा क्षण भर में गायब हो गई। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। राजा ने उसी समय पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवा दिया कि **"इस राज्य में किसी भी दरिद्र, साधु या भक्त का अपमान नहीं होगा। हर दीन में साक्षात नारायण का वास है।"**
### इस कथा का पावन संदेश:
यह कथा हमें सिखाती है कि संसार भले ही आपका साथ छोड़ दे, लेकिन यदि आपका विश्वास सच्चा है, तो भगवान स्वयं आपकी ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं। किसी सीधे-साधे और सच्चे इंसान को सताना सबसे बड़ा पाप है, क्योंकि **"भक्त के आँसू सीधे भगवान के हृदय पर गिरते हैं।"**
> *हे नाथ! जीवन के हर उतार-चढ़ाव में, सुख में या दुःख में, मेरा मन सदैव आपके श्रीचरणों में लगा रहे।*
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**मङ्गल कामनाओं के साथ...**
**जय जय जगन्नाथ!**
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