जिनके पास माँ हैं वो लोग ये जरूर पढ़ें - जब घर पर माँ आती हैं!

यूँ तो हमारे अवध क्षेत्र की तरफ बेटी के घर का पानी तक नहीं पीते हैं और आना जाना बहुत दूर की बात थी। अब लोग थोड़ा आधुनिक हो गए हैं और समयानुसार बदलाव आ गया है। अब लोग बेटी के घर जाते हैं रहते हैं, खाते पीते हैं और लौटते समय रुपये दे आते हैं कहते हैं कि जो खाया उसका मूल्य चुका दिया अब अन्न बेटी का न होकर मोल का हो गया है।

मेरी माँ भी कभी मेरे घर नहीं आई थी। आपरेशन के समय आई थी तो उतने दिनों में उन्होंने मेरी सारी गृहस्थी चमका दिया था।

किसी दिन बाहर वाले नल पर कड़ाही में रेत डालकर माजने बैठ जाती थी तो कभी लोहे का तवा चांदी सा चमकाती मिलती थी।

स्टोर रूम में रखा सारा राशन एक एक करके छत पर ले जा कर बगल वाली आंटी से सूप लेकर सब साफ करके धूप लगा कर रख दिया।

रसोई में बच्चे भोजन बनाते थे तो किसी डिब्बे में थोड़ा सा कुछ रखा है तो किसी में थोड़ा सा कुछ है।

माँ सबको निकाल कर धूप लगा कर, डिब्बे धोकर साफ करके फिर भर कर रख देती थी।

स्टोर रूम में रखे आलू कभी बीनती, कभी प्याज, लहसुन साफ करती।

जितने बोरे, झोले थे सब नहा धोकर, सुखा कर, तह लगा कर रखे गए थे।

अड़ोस पड़ोस की अंटियाँ जिनको मैं नही जानती थी वो सब माँ की सखियाँ बन गयी थी अब भी माँ के बारे में पूछती रहती हैं कि जीजी तबसे नही आई?

कोई बरतन ऐसा नही था जो चमक न रहा हो, घर के हर कोने में सफाई थी, जिस चीज की जहाँ जरूरत देखती वहाँ वो उसे साफ करने, सहेजने में लगी रहती थी।

कभी आंवले का अचार, कभी मिर्च का अचार, कभी मूली का अचार बना रही थी।

उनके जाने के बाद मेरी रसोई, घर, बरतन, मन्दिर सब व्यवस्थित और चमक रहे थे। घर के हर कोने में सकारात्मक ऊर्जा महसूस होती थी।

माँ के गाँव लौट जाने के महीनों तक माँ की छाप घर में महसूस होती रही थी।

बड़ी प्यारी सी माँ हैं मेरी

ईश्वर लंबी उम्र दें।

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