"जब पिता ने दोनों बेटों से सिर्फ एक दिन माँगा, तो एक ने कहा—'मीटिंग है'... और दूसरे ने बिना कुछ पूछे अपनी दुकान बंद कर दी।"


"बूढ़े पिता की आख़िरी इच्छा"

"जब पिता ने दोनों बेटों से सिर्फ एक दिन माँगा, तो एक ने कहा—'मीटिंग है'... और दूसरे ने बिना कुछ पूछे अपनी दुकान बंद कर दी।"

यह कहानी है रघुवीर प्रसाद की, जो अपने छोटे से कस्बे में पत्नी के निधन के बाद अकेले रह गए थे।

उनके दो बेटे थे।

बड़ा बेटा आदित्य। पढ़ाई में हमेशा अव्वल, फिर बड़ी नौकरी, महानगर में आलीशान फ्लैट, लाखों की तनख्वाह और व्यस्त जीवन।

छोटा बेटा रमेश। पढ़ाई में साधारण, लेकिन व्यवहार में असाधारण। वह कस्बे में ही एक छोटी-सी इलेक्ट्रिक रिपेयर की दुकान चलाता था। आमदनी ज्यादा नहीं थी, लेकिन उसका दिन अपने पिता के चरण छूकर ही शुरू होता था।

हर महीने आदित्य पैसे भेज देता।

महंगे कपड़े, दवाइयाँ, त्योहारों पर उपहार... किसी चीज़ की कमी नहीं रहने देता।

लेकिन उसके फोन की शुरुआत और अंत हमेशा एक जैसे होते—

"पापा, जल्दी बोलिए... अभी मीटिंग शुरू होने वाली है।"

रघुवीर प्रसाद हर बार मुस्कुरा देते।

उधर रमेश रोज़ शाम को दुकान बंद करके पिता के साथ चाय पीता।

कभी उन्हें पार्क घुमा लाता, कभी पुरानी यादें सुनता, कभी बिना किसी वजह के उनके पास बैठा रहता।

एक दिन रघुवीर प्रसाद ने दोनों बेटों को फोन किया।

उन्होंने कहा—

"बेटा, इस रविवार मेरे साथ पूरा दिन बिताना... बस यही इच्छा है।"

आदित्य ने कैलेंडर देखा।

"पापा, इस हफ्ते बहुत जरूरी प्रोजेक्ट है। अगले महीने पक्का आऊँगा।"

रमेश ने कोई सवाल नहीं पूछा।

अगले दिन दुकान पर बोर्ड टाँग दिया—

"आज दुकान बंद रहेगी। कारण—पिता के साथ समय बिताना।"

रविवार की सुबह दोनों पिता-पुत्र पुराने मंदिर गए।

फिर उसी तालाब के किनारे बैठे जहाँ कभी रमेश बचपन में मछलियों को दाना खिलाया करता था।

दोपहर को दोनों ने सड़क किनारे मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पी।

शाम को रघुवीर प्रसाद ने कहा—

"बेटा, आज कई साल बाद मुझे लगा कि मैं अभी भी ज़िंदा हूँ।"

रमेश ने मुस्कुराकर उनका हाथ पकड़ लिया।

कुछ ही दिनों बाद रघुवीर प्रसाद को दिल का दौरा पड़ा।

अस्पताल पहुँचने से पहले ही उन्होंने अंतिम साँस ले ली।

जब आदित्य पहुँचा, तब तक सब समाप्त हो चुका था।

अंतिम संस्कार के बाद रमेश ने पिता की पुरानी डायरी आदित्य को दी।

उसके आख़िरी पन्ने पर लिखा था—

"आदित्य मेरा अभिमान है... उसने मुझे कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी।

लेकिन रमेश मेरा सुकून है... उसने मुझे कभी अकेला नहीं होने दिया।

पैसा जीवन आसान बना सकता है, पर बेटे का साथ ही जीवन को जीने लायक बनाता है।"

डायरी पढ़ते-पढ़ते आदित्य की आँखों से आँसू बहने लगे।

उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसने अपने पिता के लिए सब कुछ खरीदा...

सिवाय अपने समय के।

उस दिन उसने अपने बेटे को गले लगाकर सिर्फ इतना कहा—

"बेटा, अगर मैं कभी अपने काम में इतना व्यस्त हो जाऊँ कि तुम्हारे और अपने बुज़ुर्गों के लिए समय न निकाल सकूँ... तो मुझे रोक लेना। क्योंकि इंसान की सबसे बड़ी कमाई उसका परिवार होता है।"

उस दिन से आदित्य ने एक नियम बना लिया—

हर महीने कुछ पैसे कम कमाएगा, लेकिन अपने पिता की तरह अब अपने परिवार के साथ समय ज़रूर बिताएगा।

बुज़ुर्ग माता-पिता को हमेशा पैसों की ज़रूरत नहीं होती।

उन्हें चाहिए— एक साथ बैठकर पी गई चाय, कुछ मिनटों की बातचीत, एक हाल-चाल पूछने वाला फोन, और यह एहसास कि...

"हम अभी भी अपने बच्चों की ज़िंदगी में महत्वपूर्ण हैं।"

याद रखिए...

बैंक बैलेंस विरासत बन सकता है, लेकिन साथ बिताया हुआ समय जीवनभर की याद बन जाता है।

अपने बच्चों को सफल ज़रूर बनाइए, लेकिन उससे पहले उन्हें इतना संवेदनशील बनाइए कि वे कभी अपने माता-पिता के अकेलेपन को नज़रअंदाज़ न करें।

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