गांव की सीमा जहाँ समाप्त होती थी, वहीं एक प्राचीन और रहस्यमयी कुआँ था। काई से ढकी उसकी दीवारें और उसका अथाह गहरा जल न जाने कितनी सदियों की कहानियाँ समेटे हुए था। इसी कुएँ के तट पर हर भोर एक तपस्वी संत पधारते थे।
उन संत की ख्याति दूर-दूर तक थी। उनकी तपस्या का ढंग बड़ा ही विस्मयकारी था—वे अपने शरीर को भारी-भरकम लोहे की जंजीरों से जकड़ लेते और उस गहरे कुएँ के भीतर लटक जाते। घंटों बीत जाते, वे हवा में झूलते हुए आँखें मूंदकर बस एक ही नाम रटते— "कृष्ण... कृष्ण..."
गांव वाले किनारे पर खड़े होकर श्रद्धा से भर जाते। वे सोचते कि इतनी भारी जंजीरों का कष्ट सहकर जो व्यक्ति भगवान को पुकार रहा है, वह निश्चित ही सिद्ध पुरुष होगा। संत भी अक्सर गर्व से कहते, "जिस दिन ये जंजीरें टूटेंगी, समझ लेना उसी दिन गोविंद से मेरा मिलन होगा।" वे जंजीर को अपनी सुरक्षा और अपनी तपस्या का प्रमाणपत्र मानते थे।
एक दिन, गांव का एक सीधा-साधा व्यक्ति, जिसके पास न तो ज्ञान था और न ही कोई सिद्धि, चुपचाप खड़ा यह सब देख रहा था। उसके मन में एक भोली सी जिज्ञासा जागी— "क्या भगवान सिर्फ कष्ट सहने वालों को मिलते हैं? क्या मुझ जैसा साधारण व्यक्ति उन्हें नहीं देख सकता?"
उसके पास कोई लोहे की जंजीर नहीं थी। उसने पास पड़ी एक पुरानी और कमजोर सी रस्सी उठाई। उसके मन में कोई अहंकार नहीं था, बस एक तड़प थी। उसने उस कच्ची रस्सी को अपने पैरों से बांधा और कुएँ की गहराई में लटक गया।
उसने आँखें बंद कीं और डूबते हुए मन से पुकारा:
"हे सांवरे! मुझे नहीं पता तपस्या क्या होती है। मेरे पास न जंजीरें हैं, न शक्ति। बस ये टूटी सी रस्सी है और मेरा अटूट भरोसा। मुझे थाम लो प्रभु!"
तभी एक विस्मयकारी घटना घटी। उस व्यक्ति का भार पड़ते ही वह कच्ची रस्सी 'तड़ाक' से टूट गई। वह व्यक्ति मौत के मुंह में गिरने ही वाला था कि अचानक कुएँ के भीतर एक अलौकिक प्रकाश फैल गया।
इससे पहले कि वह ठंडे पानी को छू पाता, दो कोमल और शक्तिशाली भुजाओं ने उसे बीच हवा में ही थाम लिया। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण मंद-मंद मुस्कान लिए उसे अपनी गोद में उठाए हुए थे।
वह व्यक्ति भावुक होकर प्रभु के चरणों से लिपट गया और सिसकते हुए पूछा— "प्रभु! मैं तो पापी हूँ, साधारण हूँ। वो महात्मा तो वर्षों से लोहे की जंजीरों में लटककर आपको पुकार रहे हैं, आप उनके पास क्यों नहीं गए?"
भगवान कृष्ण की मुस्कान और गहरी हो गई। उन्होंने बड़े प्रेम से कहा:
"पुत्र! वह संत मुझे पुकारते तो हैं, लेकिन उन्हें भरोसा मुझ पर नहीं, बल्कि उस मजबूत लोहे की जंजीर पर है। उन्हें लगता है कि जब तक जंजीर है, वे सुरक्षित हैं। उन्होंने जंजीर को अपनी रक्षा का आधार मान लिया है।"
"परंतु तुमने... तुमने एक कमजोर रस्सी चुनी। तुम जानते थे कि यह रस्सी तुम्हें नहीं बचा सकती। तुमने अपना पूरा जीवन, अपनी पूरी सुरक्षा मुझ पर छोड़ दी। जहाँ 'भरोसा' सौ प्रतिशत होता है, वहाँ मुझे दौड़े चले आना ही पड़ता है।"
Post a Comment