क्या आप जानते हैं कैसे एक शिकारी ने भगवान श्री कृष्ण का अंत किया और कैसे भगवान जगन्नाथ की उत्पत्ति हुई। आइए देखते हैं इस अद्भुत कथा में। महाभारत का युद्ध खत्म होने के ३६ साल बीत चुका था। एक दिन भगवान कृष्ण नदी के किनारे एक घने वृक्ष की ठंडी छांव में लेटे हुए थे। उनके दाहिने पैर का गुलाबी तलवा ऐसे चमक रहा था कि मानो कोई लाल रंग का मणि दमक रहा हो।
उसी समय उस घने जंगल में जरा नाम का एक बहेलिया शिकारी आ निकला। उसकी नजर दूर से उस लाल चमक पर पड़ी और उसको लगा कि शायद कोई हिरण झाड़ियों के पीछे छिपा बैठा है। उसने बिना सोचे समझे अपने धनुष पर एक बहुत ही घातक बाण चढ़ाया और छोड़ दिया। बाण सीधा जाकर भगवान कृष्ण के कोमल चरण में धंस गया। जब जरा दौड़ता हुआ पास आया तो उसने जो देखा उससे उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने देखा कि उसका बाण किसी जानवर को नहीं बल्कि स्वयं त्रिभुवन के स्वामी भगवान कृष्ण के पैर में लगा है। रक्त की धारा बह रही थी। यह दृश्य देखकर जरा बहुत बुरी तरह से रोने लगा। वह इतना व्याकुल हो गया कि पछाड़ खाकर जमीन पर गिर पड़ा। वह रोते हुए भगवान के चरणों से लिपट गया और बोला—हे नाथ, हे भगवान मुझे क्षमा कर दें। मुझसे अनजाने में बहुत बड़ा अनर्थ हो गया कि मैंने आपके इन कोमल चरणों पर बाण चला दिया। हे प्रभु इस घोर पाप के लिए तो मृत्युदंड भी बहुत छोटा है। मैं तो नर्क के भी लायक नहीं रहा।
जरा को इस कदर व्याकुल देखकर दयालु भगवान कृष्ण मुस्कुराए और बोले— जरा तुम क्यों इतना रो रहे हो? तुमने कोई अपराध नहीं किया है कि तुम इतना विलाप करो। याद है ना कि तुम त्रेता युग में वानर राज बाली थे। उस जन्म में मैंने राम अवतार में एक पेड़ के पीछे छिपकर तुम्हारा वध किया था, जो कि युद्ध के नियमों के विपरीत था। इसीलिए मेरी यह विदाई तुम्हारे ही हाथों पहले से तय थी। तुम इस अपराध बोध से पूरी तरह मुक्त हो जाओ।
इतना कहकर भगवान कृष्ण ने अपनी इस भौतिक लीला को समेट लिया और अपने गोलोक धाम के लिए विदा हो गए। जरा व्याकुल होकर रोता बिलखता हुआ सीधे अर्जुन के पास गया और सारी स्थिति के बारे में बताया। जरा रोते हुए बोला—हे पांडव श्रेष्ठ मेरा वध कर दीजिए। मुझसे अनजाने में घोर अपराध हो गया है। मेरे बाण से भगवान कृष्ण ने अपने प्राण त्याग दिए हैं।
यह सुनकर अर्जुन के हृदय में जैसे वज्रपात हो गया। अर्जुन बहुत व्याकुल हो उठे और रोते हुए बोले—ये तुम क्या कह रहे हो जरा? ऐसा अनर्थ कैसे हो सकता है? माधव मुझे छोड़कर कैसे जा सकते हैं? रोते हुए कांपते हुए हाथों से अर्जुन ने गहरे दुख और आंसुओं के साथ भगवान कृष्ण का अंतिम संस्कार किया।
अग्नि की लपटों ने भगवान के पूरे शरीर को राख में बदल दिया, लेकिन एक बहुत ही चमत्कारिक बात हुई। अर्जुन ने देखा कि राख के बीच में एक चीज वैसी की वैसी बची हुई है। वह था भगवान कृष्ण का दिव्य हृदय—वो हृदय जो अपने भक्तों के लिए हमेशा धड़कता रहता है। वो आज भी धड़क रहा था। वह अग्नि से बिल्कुल भी नहीं जला था।
अर्जुन समझ नहीं पा रहे थे कि अब वह क्या करें। तभी आकाश से भगवान कृष्ण की दिव्य आकाशवाणी हुई— हे अर्जुन तुम व्याकुल ना हो। यह मेरा दिव्य हृदय है जो अग्नि में कभी भस्म नहीं हो सकता। तुम इस हृदय को एक लकड़ी के तख्ते पर रखकर समुद्र की ओर बहने वाली नदी में प्रवाहित कर दो। कलयुग में यह मेरे भक्तों के लिए ऐसे ही धड़कता रहेगा।
भगवान की आज्ञा पाकर अर्जुन ने उस धड़कते हुए जीवंत हृदय को बहुत ही सम्मान और आंसुओं के साथ एक लकड़ी के तख्ते पर रख दिया और उसे नदी की लहरों में प्रवाहित कर दिया। वह दिव्य हृदय नदी की लहरों पर बहता रहा और बहुत समय बाद उड़ीसा के पवित्र महानदी तट पर पहुंच गया। उस समय वहां सबर नाम का एक सरल आदिवासी समुदाय रहता था। विश्वावसु उस समुदाय का मुखिया था। एक दिन उसने उस लकड़ी के तख्ते को देखा। पास जाकर देखा तो उस पर एक दिव्य हृदय रखा था, जिससे नीली आभा निकल रही थी। उसने तुरंत पहचान लिया कि यह कोई साधारण वस्तु नहीं है। वह उसे एक गुप्त गुफा में ले गया और नीलमाधव के रूप में उसकी पूजा करने लगा।
उसी समय अवंती नगरी में इंद्रदुम्न नाम के एक महान राजा थे। वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे। एक दिन एक साधु ने उन्हें नीलमाधव के बारे में बताया। यह सुनकर राजा ने अपने ब्राह्मण पुजारी विद्यापति को खोज के लिए भेजा।
विद्यापति लंबी यात्रा के बाद विश्वावसु के पास पहुंचे। पहले तो विश्वावसु ने गुफा का रास्ता दिखाने से मना कर दिया, लेकिन बाद में अपनी बेटी ललिता के आग्रह पर मान गए। शर्त यह थी कि विद्यापति आंखों पर पट्टी बांधकर ही जाएंगे। रास्ता याद रखने के लिए विद्यापति ने सरसों के बीज गिरा दिए।
कुछ समय बाद उन बीजों से पौधे उग आए और रास्ता बन गया। राजा इंद्रदुम्न उस रास्ते से गुफा तक पहुंचे, लेकिन वहां नीलमाधव गायब हो चुके थे। राजा बहुत दुखी हो गए।
तभी भगवान विष्णु ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और कहा— समुद्र तट पर एक दिव्य लकड़ी का लट्ठा मिलेगा, उससे मेरी मूर्तियां बनवाओ।
अगले दिन वह लट्ठा मिला, लेकिन कोई उसे हिला नहीं सका। अंत में विश्वावसु ने उसे छुआ और वह हल्का हो गया। फिर एक बूढ़ा बढ़ई आया, जो वास्तव में भगवान विश्वकर्मा थे। उन्होंने शर्त रखी कि २१ दिन तक कोई दरवाजा नहीं खोलेगा।
१५ दिन बाद आवाज बंद हो गई। रानी के कहने पर राजा ने दरवाजा खोल दिया। अंदर से विश्वकर्मा गायब थे और मूर्तियां अधूरी थीं— बड़ी आंखें लेकिन अधूरे हाथ-पैर।
राजा दुखी हो गए, लेकिन तभी उन्हें मूर्तियों के भीतर धड़कते हृदय की आवाज सुनाई दी। उन्होंने समझ लिया कि यही भगवान का सच्चा स्वरूप है।
तभी से उसी रूप में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की पूजा होने लगी। यही कारण है कि आज भी भगवान जगन्नाथ को जीवित देवता माना जाता है, जिनका हृदय आज भी धड़कता है।
🙏 जय-जय श्री जगन्नाथ 🙏
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