कैलाश पर्वत पर एक दिन ऐसा अद्भुत प्रसंग घटित हुआ जिसे सुनकर देवता भी आश्चर्य में पड़ गए।
यह घटना उस समय की है जब भगवान शिव गहन ध्यान में लीन थे और समस्त लोकों में उनका तेज व्याप्त था। उसी समय भगवान हनुमान, जो स्वयं शिव के अंश माने जाते हैं, अपने आराध्य श्रीराम के नाम का जप करते हुए एक विचार में डूब गए। उनके मन में प्रश्न उठा कि संसार में सबसे महान कौन है—वह जो अपार शक्ति का स्वामी है या वह जो अपने भक्तों के लिए स्वयं को समर्पित कर देता है? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए उन्होंने एक अनोखी लीला करने का निश्चय किया।
हनुमान जी सीधे कैलाश पहुंच गए। वहां उन्होंने देखा कि असंख्य गण भगवान शिव की महिमा का गुणगान कर रहे हैं। सभी कह रहे थे कि महादेव से बड़ा कोई नहीं, उनके समान त्यागी, तपस्वी और करुणामय कोई नहीं। यह सुनकर हनुमान जी मुस्कुराए और बोले, “यदि महादेव इतने ही करुणामय हैं, तो क्या वे अपने भक्त की हर बात सहन कर सकते हैं?” गणों ने उत्तर दिया, “निश्चित ही, महादेव तो भोलेनाथ हैं। भक्तों के लिए वे सब कुछ त्याग सकते हैं।” तभी हनुमान जी ने निश्चय किया कि वे स्वयं शिव जी की परीक्षा लेंगे।
उन्होंने एक साधारण वानर का रूप धारण किया और कैलाश के निकट एक पर्वत शिखर पर बैठ गए। वहां उन्होंने ऊंचे स्वर में श्रीराम का नाम जपना आरंभ कर दिया। उनका जप इतना मधुर और प्रभावशाली था कि चारों दिशाओं में रामनाम की ध्वनि गूंजने लगी। धीरे-धीरे कैलाश के गण, सिद्ध, योगी और ऋषि भी उस जप को सुनने लगे। सभी का ध्यान महादेव की स्तुति से हटकर रामनाम की ओर आकर्षित होने लगा। कुछ समय बाद यह समाचार भगवान शिव तक भी पहुंचा।
महादेव ने अपनी आंखें खोलीं और मुस्कुराकर कहा, “यह कोई साधारण वानर नहीं हो सकता। रामनाम में ऐसी शक्ति केवल सच्चे भक्त के हृदय से ही निकल सकती है।” फिर भी उन्होंने कुछ नहीं कहा और शांत भाव से देखते रहे। लेकिन हनुमान जी अपनी लीला को आगे बढ़ाना चाहते थे। उन्होंने जप के साथ-साथ यह कहना शुरू किया कि जो राम के चरणों में समर्पित है, उसे किसी और की आवश्यकता नहीं। यह सुनकर कुछ गणों को लगा कि यह वानर महादेव का अपमान कर रहा है।
नंदी क्रोधित होकर हनुमान जी के पास पहुंचे और बोले, “हे वानर! क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि यह कैलाश है? यहां महादेव का निवास है। तुम उनके सामने ऐसी बातें कैसे कह सकते हो?” हनुमान जी ने विनम्रता से उत्तर दिया, “मैं तो केवल अपने प्रभु श्रीराम का नाम ले रहा हूं। यदि रामनाम में किसी को कष्ट होता है, तो मैं क्या कर सकता हूं?” नंदी निरुत्तर हो गए, लेकिन गणों का क्रोध बढ़ता गया।
जब यह बात महादेव तक पहुंची तो वे स्वयं वहां आए। समस्त देवता यह दृश्य देखने लगे। एक ओर भगवान शिव थे, दूसरी ओर उनके ही अंश और परम भक्त हनुमान। महादेव ने प्रेमपूर्वक पूछा, “हे वानर! तुम कौन हो और यह लीला क्यों कर रहे हो?” हनुमान जी ने सिर झुकाकर कहा, “मैं तो एक साधारण रामभक्त हूं। मैं केवल यह जानना चाहता हूं कि संसार में सबसे बड़ी शक्ति कौन सी है—तप, ज्ञान, वैभव या भक्ति?”
यह सुनकर महादेव कुछ क्षण मौन रहे। फिर उन्होंने कहा, “तप से शक्ति मिलती है, ज्ञान से विवेक मिलता है, वैभव से सम्मान मिलता है, लेकिन भक्ति वह शक्ति है जिसके आगे स्वयं भगवान भी बंध जाते हैं।” हनुमान जी ने फिर पूछा, “यदि ऐसा है, तो क्या भक्ति आपके समान महान देव को भी झुका सकती है?” महादेव मुस्कुराए और बोले, “निश्चित ही। सच्ची भक्ति के सामने मैं भी नतमस्तक हो जाता हूं।”
इतना सुनते ही हनुमान जी अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गए। उनके दर्शन करते ही समस्त गण और देवता आश्चर्यचकित रह गए। हनुमान जी ने तुरंत महादेव के चरणों में दंडवत प्रणाम किया और कहा, “पिताश्री! मैंने आपकी परीक्षा लेने का साहस किया। मुझे क्षमा करें। मैं संसार को यह दिखाना चाहता था कि भगवान की सबसे बड़ी शक्ति उनका प्रेम और करुणा है, न कि उनका वैभव।” महादेव ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया।
उस क्षण कैलाश पर अद्भुत प्रकाश फैल गया। देवताओं ने पुष्पवर्षा की। भगवान शिव बोले, “हनुमान! तुमने आज संसार को सबसे बड़ा सत्य बताया है। भक्ति ही वह मार्ग है जो भगवान और भक्त को एक सूत्र में बांधता है। जहां प्रेम है, वहां अहंकार नहीं। जहां समर्पण है, वहां भेदभाव नहीं।”
हनुमान जी की आंखों से प्रेमाश्रु बहने लगे। उन्होंने कहा, “प्रभु, मैं सदैव आपका और श्रीराम का सेवक हूं। मेरे लिए आप दोनों में कोई भेद नहीं।” यह सुनकर महादेव अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, “यही सच्ची भक्ति है। जो प्रेम में भेद नहीं देखता, वही वास्तव में भगवान के निकट होता है।”
उस दिन के बाद देवताओं ने समझ लिया कि शक्ति से बड़ी भक्ति है, ज्ञान से बड़ा प्रेम है और भगवान को जीतने का एकमात्र मार्ग निष्कपट समर्पण है। हनुमान जी ने अपने पिता समान शिव जी की परीक्षा अवश्य ली, लेकिन अंत में जीत किसी की हार में नहीं, बल्कि प्रेम और भक्ति की महिमा में हुई। तभी से यह कथा सुनाई जाती है कि भगवान और भक्त के बीच का संबंध अधिकार का नहीं, प्रेम का होता है, और जहां प्रेम होता है वहां स्वयं भगवान भी अपने भक्त के आगे झुक जाते हैं।
॥ जय श्रीराम जय हनुमान हर हर महादेव ॥
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