"अजनबी जनवरी की सर्द रात कोहरा भी काफी था ऐसे मे सुधा को रात 8:30 की ट्रेन पकड़नी थी वापस घर जाने को यहां वो अपने मम्मी पापा से मिलने आई थी और पति मोहन आँफिस की व्यस्तता के चलते उसके साथ नही आए थे

खैर. इससे पहले भी वो अकेले सफर कर चुकी थी मगर उसरात कुछ ज्यादा ही कोहरा छाया था स्टेशन पहुंची तो पता चला उसकी ट्रेन पांच घंटे लेट है।

मां अकेली थी सो पिताजी को वापस भेज दिया मगर मन मे डर था अब अकेले स्टेशन पर वो कैसे पांच घंटे बिताएगी टिकट एसी कोच का था सो वो वैंटिंग रुम मे पहुंची मगर वहां सिर्फ दो पुरूष थे ।

वो भय के चलते गेट के पास वाली बैंच पर बैठ गई कुछ देर मे उन दो पुरुष यात्रियों मे से एक उठकर चला गया शायद उसकी ट्रेन आ गई थी अब उस कमरे मे केवल सुधा और वो अजनबी पुरुष था । मगर वो अजनबी चुपचाप अखबार को धीमी रोशनी मे पढने की कोशिश कर रहा था अभी कुछ देर ही बीती थी की बाहर से कुछ लोगों की आवाजें आने लगी शायद उनकी भी ट्रेन लेट थी लेकिन वो जब अंदर आए तो उनके साथ शराब की बदबू भी आनी शुरू हो गई सुधा को अब कुछ सही नहीं महसूस हो रहा था कयोंकि हालात ऐसे थे वो उस कमरे मे एक अकेली महिला थी और उस कमरे मे पुरुषों की संख्या अब चार थी ।

ऊपर से आए दिन समाज मे होती रेप जैसी वारदातों से पहले ही मन घबराया हुआ था अचानक कमरे मे पहले वाले पुरुष यात्री ने अपना बैग उठाया और सुधा के पास आकर दोनों के बीच बैग रखकर वहीं बैठ गया ।

सुधा अबभी खौफ मे थी तभी एक चायवाले ने अंदर आते आवाज दी -चाय गर्म चाय गर्म उस पुरुष यात्री ने दो चाय का इशारा किया एक स्वयं लेकर दूसरी सुधा को देने को कहा चायवाले ने वैसा ही किया इससे पहले सुधा चाय के पैसे देती उस अजनबी ने चाय के पैसे दे दिए समय बीता और ट्रेन की घोषणा हुई उस अजनबी की ट्रेन आ गई थी पहले तो वो उठा फिर बोला-अरे कया बात है चलिए ना दीदी अपनी ही ट्रेन की घोषणा हुई है ।

सुधा ने एकटक उसे देखा और फिर उन तीनों शराबियों को देखा फिर चुपचाप उठी और वो भी बाहर चल दी बाहर पहुंचकर उस अजनबी ने कहा- देखिए मुझे नही पता ये आपकी ट्रेन है या नही बहन पर मुझे उन शराबियों के बीच आपको अकेले बैठे छोडने का मन नही था इसीलिए...

वैसे ये मेरी ट्रेन तो है अगर आपकी भी है तो आप अपने कोच की तरफ चले जाइए सुधा ने कहा-जी.ये मेरी ट्रेन नही है अभी कुछ वक्त लगेगा आप जाइए उस अजनबी ने एकबारगी कुछ सोचा और फिर कहा- बहन आप घबराइए नही मे अगली ट्रेन पकड लूंगा मगर ऐसी स्थिति मे जैसे हर भाई को करना चाहिए मै भी वहीं करूंगा और उसने वो ट्रेन छोड दी ...

कुछ समय बाद सुधा की ट्रेन आई तो उस अजनबी ने सुधा को उसके कोच मे बैठने मे मदद की और बाहर खडे होकर ट्रेन चलने का इंतजार करने लगा जैसे जैसे ट्रेन चलने लगी वैसे वैसे वो अजनबी सुधा की नजरों से दूर हो रहा था सुधा ने दोनों हाथों को जोड़कर उस अजनबी को धन्यवाद दिया और उस अजनबी के लिए अपने भगवान से प्रार्थना करने लगी .....शायद आज उसे समाज में होती वारदातों से जो भरोसा जो विश्वास खो रहा था आज वापस से उसे वहीं भरोसा वहीं विश्वास महसूस हो रहा था .

मेरे दोस्तों.....सचमुच पांचो अंगुलियां बराबर नही होती ...

आज भी समाज मे ऐसे लोग भी मौजूद है जो अपने घरों की तरह बाहर समाज मे बहन बेटियों की इज्ज़त करते हैं उनका सम्मान करते है और जहां एक अभिभावक की तरह उनकी रक्षा को खडे होना होता है वह वहां मौजूद रहते है.।

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