रेलवे स्टेशन पर हुई एक अनजान लड़की से मुलाकात, फिर शुरू हुई ऐसी प्रेम कहानी जिसने 7 साल बाद खोला ऐसा रहस्य कि दोनों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई


कहानी: "आखिरी चिट्ठी का इंतज़ार"

बरसात की एक ठंडी शाम थी। दिल्ली रेलवे स्टेशन पर लोगों की भीड़ अपने-अपने सफर में व्यस्त थी। उसी भीड़ में 28 वर्षीय आरव भी खड़ा था। उसकी ट्रेन तीन घंटे लेट थी। इंतजार करते-करते वह प्लेटफॉर्म की एक बेंच पर जाकर बैठ गया।

तभी उसकी नजर सामने बैठी एक लड़की पर पड़ी। सफेद सूट, हाथ में पुरानी डायरी और आंखों में ऐसा दर्द, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल था।

कुछ देर बाद लड़की की डायरी नीचे गिर गई। आरव ने उठाकर उसे लौटाई।

"थैंक्यू..." लड़की ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

"लगता है इस डायरी में कोई बहुत खास बात है?" आरव ने पूछा।

लड़की मुस्कुराई, लेकिन उसकी आंखें नम हो गईं।

"इसमें मेरी पूरी जिंदगी है... और शायद मेरा अधूरा प्यार भी।"

आरव चुप हो गया।

दोनों की ट्रेन देर से थी। बातें शुरू हुईं और कब रात के दो बज गए, उन्हें पता ही नहीं चला।

लड़की का नाम मीरा था।

मीरा ने बताया कि उसने आज तक किसी से अपने दिल की बात नहीं कही।

जाने क्यों, पहली ही मुलाकात में उसे लगा कि आरव उसे समझ सकता है।

ट्रेन आने लगी।

मीरा ने जाते-जाते अपनी डायरी से एक पन्ना फाड़कर आरव के हाथ में रख दिया।

उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

"अगर किस्मत ने चाहा... तो हम फिर मिलेंगे।"

ट्रेन चल पड़ी।

आरव काफी देर तक उसी कागज को देखता रहा।

...

समय गुजरता गया।

एक महीना...

छह महीने...

एक साल...

आरव रोज उसी प्लेटफॉर्म पर जाने लगा।

लेकिन मीरा कभी नहीं मिली।

धीरे-धीरे उसने मान लिया कि शायद वह मुलाकात सिर्फ एक खूबसूरत संयोग थी।

फिर एक दिन...

करीब सात साल बाद...

आरव एक अस्पताल में अपनी मां का इलाज कराने गया।

वह बिल जमा करने के लिए लाइन में खड़ा था।

तभी सामने वही आवाज सुनाई दी...

"आरव..."

उसका दिल जैसे धड़कना भूल गया।

वह पलटा...

सामने मीरा खड़ी थी।

लेकिन इस बार उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

वह बहुत कमजोर दिख रही थी।

आरव खुशी से भर गया।

"मीरा... तुम कहाँ चली गई थीं?"

मीरा की आंखों से आंसू बहने लगे।

उसने धीमी आवाज में कहा—

"मैं तुम्हें ढूंढ़ना चाहती थी...

लेकिन मेरे पास समय बहुत कम था।"

आरव कुछ समझ नहीं पाया।

मीरा ने अपने बैग से वही पुरानी डायरी निकाली।

उसके बीचों-बीच एक मेडिकल रिपोर्ट रखी थी।

उसमें लिखा था—

"ब्लड कैंसर – अंतिम चरण"

आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

मीरा बोली—

"जब हम पहली बार मिले थे...

उसी दिन मुझे अपनी बीमारी का पता चला था।

मैं नहीं चाहती थी कि कोई मेरी वजह से अपनी जिंदगी बर्बाद करे।

इसलिए बिना बताए चली गई।"

आरव की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।

उसने मीरा का हाथ पकड़ लिया।

"अगर प्यार सच होता है...

तो बीमारी उससे बड़ी नहीं होती।"

मीरा पहली बार खुलकर रोई।

दोनों ने फैसला किया कि अब जितना भी समय बचा है...

वह साथ बिताएंगे।

अगले छह महीने...

उन्होंने पहाड़ देखे...

बारिश में भीगे...

सड़क किनारे चाय पी...

पुरानी फिल्मों पर हंसे...

और जिंदगी के हर छोटे पल को जी लिया।

एक सुबह...

मीरा ने आरव का हाथ पकड़ा...

मुस्कुराई...

और धीरे से कहा—

"देखा... किस्मत ने हमें फिर मिला ही दिया..."

इतना कहकर उसने हमेशा के लिए अपनी आंखें बंद कर लीं।

आज भी आरव हर साल उसी रेलवे स्टेशन की उसी बेंच पर जाकर बैठता है।

उसके हाथ में वही पुरानी चिट्ठी होती है...

जिस पर लिखा है—

"अगर किस्मत ने चाहा... तो हम फिर मिलेंगे।"

और वह आज भी मानता है...

सच्चा प्यार कभी खत्म नहीं होता, वह सिर्फ इंतजार करना सिखा देता है।

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