मैं अंतिम संस्कार से घर लौटी। मेरे पति ने कहा, “माँ ने सब कुछ मेरे नाम कर दिया है। तुम्हारे पास अपना सामान समेटने के लिए 48 घंटे हैं...!


मैं अंतिम संस्कार से घर लौटी। मेरे पति ने कहा, “माँ ने सब कुछ मेरे नाम कर दिया है। तुम्हारे पास अपना सामान समेटने के लिए 48 घंटे हैं...!!

मेरे पति, मेरा बेटा, मेरी ननद और एक वकील—जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था। जब मैं श्मशान से लौटकर आई, वे सब मेरे ड्राइंग रूम में बैठे थे।कानूनी सलाह...!!

फरवरी की बारिश ने मेरी काली साड़ी और शॉल को पूरी तरह भिगो दिया था। मेरी सास। वह औरत जिसकी मैंने दस साल तक देखभाल की—पहले स्ट्रोक से लेकर आख़िरी साँस तक...!!

मैं दरवाज़े पर रुक गई। अंतिम संस्कार के जूतों से लकड़ी के फर्श पर गीले निशान पड़ रहे थे।

रोहित, मेरे पति, सास की पसंदीदा कुर्सी पर बैठे थे। वह कभी उस कुर्सी पर नहीं बैठे थे—यहाँ तक कि जब वह ज़िंदा थीं।

“कविता” उसने बिना उठे कहा, “हमें बात करनी है...!!

मेरा बेटा रौनक, 24 साल का, सोफे पर बैठा था और मेरी ओर देखने से बच रहा था। रोहित की छोटी बहन सोनम उसके बगल में फ़ाइल गोद में रखे बैठी थी। वह अनजान वकील खिड़की के पास कुर्सी पर था...!!

“क्या मैं कम से कम अपना शॉल उतार सकती हूँ?” मैंने पूछा।

“इसमें ज़्यादा समय नहीं लगेगा,” नठंडे स्वर में कहा। वह घर के अंदर भी धूप का चश्मा लगाए हुए थी।

मैंने शॉल टाँग दी...!!

कविता रोहित ने आदेश दिया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी बेरुख़ी थी जिसे मैं पहचान नहीं पा रही थी।

मैं कुर्सी पर बैठ गई—अपने ही घर में बची इकलौती खाली जगह पर...!!

रोहित ने फ़ाइल खोली।

“मुझे माँ की वसीयत मिल गई। यह उनके कमरे में थी, दवाइयों के साथ...!!

मेरा सीना भारी हो गया। मेरी सास और मैं कई बार उसकी वसीयत के बारे में बात कर चुकी थीं...!!

"माँ ने घर रोहित के नाम छोड़ा है," वकील नने कहा।

"और तुम्हारे लिए, कविता रोहित ने चश्मे के ऊपर से मुझे देखा।

"माँ ने तुम्हारी सेवाओं के बदले पाँच १० लाख छोड़े हैं।"

मेरी सेवाओं के बदले।

दस साल...!!

दस साल कपड़े बदलना, खाना खिलाना, नहलाना, दर्द में थामे रखना। दस साल जब मैंने अपना करियर, अपनी पहचान छोड़ दी-जबकि रोहित और कविता शायद ही कभी मिलने आते थे...!!

"यह मुमकिन नहीं है," मैंने फुसफुसाकर कहा।

"सास ने मुझसे कहा था कि घर मेरा होगा।

"माँ भारी दवाइयाँ ले रही थीं," रोहित ने कहा।

"उनका दिमाग़ साफ़ नहीं था।"

"वह पूरी तरह होश में थीं," मैंने कहा।

"सब कुछ काग़ज़ों में है," कबीता ने फ़ाइल पर थपकी दी।

वकील ने गला साफ़ किया...!!

"श्रीमती मैं वकील हूँ। मुझे आपको सूचित करना है कि आपके पास यह घर खाली करने के लिए 48 घंटे हैं।"

"48 घंटे?" मैंने अपने बेटे की ओर देखा।

वो अपने हाथों को देखता रहा।

"पापा कहते हैं... यही दादी चाहती थीं...!!

"तुम्हारे पापा ने उन्हें छह महीने तक नहीं देखा," मेरी आवाज़ काँप रही थी...!!

"जब वह दर्द से चिल्लाती थीं, तब तुम लोग कहाँ थे? जब वह मेरा हाथ पकड़कर रोती थीं?"

"रोहित कविता खड़ा हो गया...!!

"यही मेरी माँ की इच्छा थी। तुम्हें इतना ही मिलेंगे। रौनक हमारे साथ रहेगा। अपना सामान बाँधो और चली जाओ।

हमारे साथ

जैसे वे एक नया परिवार हों-और मैं एक बाहरी...!!

"आपके पास 48 घंटे हैं," वकील ने दोहराया।

"नहीं तो हम बेदखली की कार्रवाई करेंगे।"

मैं धीरे से खड़ी हुई।

मैं उनके सामने टूटने वाली नहीं थी...!!

दस साल की देखभाल ने मुझे एक बात सिखाई थी-हर लड़ाई तुरंत नहीं जीती जाती।

कभी-कभी इंतज़ार करना पड़ता है।

"मैं समझ गई," मैंने शांत स्वर में कहा।

वे हैरान थे। शायद उन्हें एक तमाशे की उम्मीद थी।

मैं ऊपर गई, ज़रूरी सामान बैग में रखा और लिफ़ाफ़ा संभाल लिया...!!

वही लिफ़ाफ़ा जो मेरी सास ने अपनी मौत से तीन दिन पहले मुझे दिया था - पूरी होशियारी में...!!

उसने मेरी कलाई पकड़कर फुसफुसाया थाः मेरे बच्चे अच्छे इंसान नहीं हैं। अब मैं जानती हूँ। उन्हें मत बचाओ। अब किसी को तुम्हारी रक्षा करनी चाहिए।"

उसने मुझसे कसम ली थीः

"मेरे जाने से पहले इसे मत खोलना।"

अगले 48 घंटे मैंने एक सस्ते होटल में बिताए...!!

तीसरे दिन, मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।

अंदर एक बैंक लॉकर की चाबी थी और सास की काँपती लिखावट में एक नोटः....!!

बहू मैं अपने बच्चों को जानती हूँ। मैंने तैयारी कर रखी है। मुझ पर रोसा करो। असली वसीयत लॉकर में है। वकील को फोन करो...!!

मैंने वकील को फोन किया। उनका दफ़्तर शहर के बीचों-बीच था। वह एक बुजुर्ग व्यक्ति थे, दयालु आँखों वाले...!!

"श्रीमती उन्होंने कहा, "मैं आपका इंतज़ार कर रहा था...!!

हमने साथ मिलकर लॉकर खोला। अंदर एक सीलबंद लिफ़ाफ़ा, एक पेन ड्राइव और मोटी फ़ाइल थी...!!

"यह सास की आधिकारिक वसीयत है," बाक़ील ने कहा। "पिछले साल 15 जून को रजिस्टर की गई थी...!!

उन्होंने पढ़कर सुनाया।

घर मेरा था।

रोहित का नहीं।

मेराचार सारे पैसे भी मेरे थे...!!

रोहितऔर कविता को ५ -५ लाख -एक शर्त परः अगर उन्होंने वसीयत को चुनौती दी, तो उन्हें कुछ नहीं मिलेगा।

"लेकिन उनके पास भी एक वसीयत है," मैंने कहा...!!

"वकीलने मुझे दिखाई थी।"

"वह नकली है," वकीलने शांत स्वर में कहा।

"और यह एक गंभीर अपराध है। मेरे सास को पता था कि वे ऐसा करेंगे...!!

उन्होंने पेन ड्राइव चलाया। स्क्रीन पर सास का चेहरा उभरा-वह उसी दफ़्तर में बैठी थी, अपनी पसंदीदा स्वेटर में...!!

"मेरा बेटा और बेटी " उसने कैमरे से कहा, "सालों से मेरी ज़िंदगी में नहीं रहे। उन्हें मेरी देखभाल बोझ लगती है...!!

उसकी आवाज़ भर्रा गई...!!

"मेरी बहू, , दस साल तक मेरा एकमात्र सहारा रही। उसने मेरी गरिमा बचाने के लिए अपनी ज़िंदगी कुर्बान की...!!

उसने सीधे कैमरे में देखा...!!

"मेरी bhuu सब कुछ पाने की हक़दार है। घर उसका है। अगर मेरे बच्चे उससे यह छीनने की कोशिश करें-तो उन्हें कुछ नहीं मिलेगा।"

मैं चुपचाप रो पड़ी। बकील ने मुझे रूमाल दिया।

"और भी है," उन्होंने कहा...!!

"मेरी सास ने सब दर्ज किया था-हर बार जब वे नहीं आए, हर झूठ। नर्सों की गवाही भी है।"

उन्होंने मुझे गंभीरता से देखा।

"अगर वे उस नकली वसीयत का इस्तेमाल करते हैं, तो यह धोखाधड़ी होगी...!!

"मुझे क्या करना चाहिए?"

"घर जाइए,” उन्होंने कहा।

"वह आपका घर है। और पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराइए।"

मैंने अगले दिन शिकायत दर्ज कराई...!!

तीन दिन बाद, मैं अपने घर पहुँची।

दो पुलिस गाड़ियाँ पहले से वहाँ थीं।

मै कार की खिड़की से देखती रही- पुलिस ने दरवाज़ा खटखटाया।

रोहित ने खोला...!!

हथकड़ियाँ लगते ही उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

रोहित और कविता -दोनों को ले जाया गया।

वे मेरी सास की चीजें बेचने की तैयारी कर रहे थे।

उस रात मेरे बेटे ने मुझे फोन किया।

"माँ..." उसकी आवाज़ काँप रही थी...!!

"मुझे माफ़ कर दो। मुझे नहीं पता था। पापा ने वसीयत दिखाई थी-मुझे लगा असली है।"

"क्या तुमने जालसाज़ी में मदद की?"

"नहीं! कसम से नहीं!"

वह रोने लगा।

"मुझे तुमसे पूछना चाहिए था...!!

"तुम्हें अपनी दादी से मिलने जाना चाहिए था," मैंने धीरे से कहा। "लेकिन तुम जवान थे। अपने पिता पर भरोसा कर बैठे।"

"माँ, आप कहाँ हैं?"

"घर पर...!!

मुक़दमा था। रोहित और कविता ने अपराध स्वीकार कर लिया। रोहित को 18 महीने, कबीता को एक साल की सज़ा हुई...!!

उसके बाद मेरा बेटा हर हफ्ते मिलने आने लगा। हम ड्राइंग रूम में बैठते, चाय पीते-और एक-दूसरे को फिर से जानने लगे।

"उसने मुझे क्यों नहीं बताया?" उसने एक दिन पूछा...!!

"क्योंकि वह जानती थी कि तुम तैयार नहीं थे," मैंने कहा। "तुम्हें उसके और अपने पिता के बीच चुनना पड़ता...!!

मैंने घर नहीं बेचा...!!

उस पैसे से मैंने "मागरट हाउस" की स्थापना की-देखभाल करने वाले परिवारों के लिए एक सहायता केंद्र।

मैं सब कुछ अपने ड्राइंग रूम से ही चलाती थी...!!

मेरा बेटा में मेरी मदद करता।

मैंने उसे सीखते देखा कि देखभाल बोझ नहीं, बल्कि प्रेम का सौभाग्य...!!

मेरी सास की मृत्यु के एक साल बाद, हमने बगीचे में गुलाब लगाए।

"उसे पता था, है ना?" मेरे बेटे ने मिट्टी में हाथ डालते हुए पूछा।

"पापा और बुआ क्या करने वाले थे

"उसे शक था," मैंने कहा।

"और उसने मेरी रक्षा की।"

"क्या आप कभी पापा को माफ़ करेंगी?"

मैंने उन वर्षों के बारे में सोचा-जब मैंने खुद को छोटा किया, ताकि रोहित बड़ा महसूस कर सके...!!

"शायद एक दिन," मैंने ईमानदारी से कहा।

"लेकिन सिर्फ़ अगर मैं चाहूँ...!!

उस रात, मुझे फोटो ऐल्बम में मेरी सास का एक और नोट मिला।

प्रिय अगर तुम यह पढ़ रही हो, तो मेरा प्लान कामयाब रहा। तुम सुरक्षित हो।

मुझे अफ़सोस है कि मैं तुम्हें ज़िंदा रहते ज़्यादा नहीं दे सकी...!!

लेकिन अब यह देती हूँ- इजाज़त । खुद को कुर्बान करना बंद करने की इजाज़त।

जगह लेने की इजाज़त...!!

तुमने बहुत समय दूसरों के आराम की वास्तुकार बनकर बिताया।

अब अपने लिए कुछ बनाओ...!!

मैं पहली बार अंतिम संस्कार के बाद राहत के आँसू रोई।

मैं अब बलि का बकरा नहीं थी...!!

मैं -62 साल की, एक घर की मालिक, एक संस्था की संस्थापक, और एक ऐसी औरत जिसे इतना प्यार मिला कि किसी ने मरने के बाद भी उसके लिए लड़ाई लड़ी...!!

रोहित ने ने मुझे 48 घंटे दिए थे ज़िंदगी समेटने के लिए। मेरी सास ने मुझे मेरी पूरी बची हुई ज़िंदगी दे दी-उसे जीने के लिए...!!!!!

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