रमेश जी एक साधारण रिक्शा चालक थे। उनकी पत्नी का निधन बेटी अनन्या के जन्म के समय ही हो गया था। उन्होंने अपनी बेटी को अकेले ही पाल-पोसकर बड़ा किया


रमेश जी एक साधारण रिक्शा चालक थे। उनकी पत्नी का निधन बेटी अनन्या के जन्म के समय ही हो गया था। उन्होंने अपनी बेटी को अकेले ही पाल-पोसकर बड़ा किया।
हर सुबह 4 बजे उठकर वे रिक्शा चलाने निकल जाते, फिर अनन्या को स्कूल छोड़ते और रात को उसे पढ़ाते। उनके पास एक ही अनमोल चीज़ थी, एक पुरानी चाँदी की घड़ी, जो उन्हें उनके पिता ने दी थी।
जब अनन्या छोटी थी, तो अक्सर पूछती, "पापा, आप ये घड़ी हमेशा अपने साथ क्यों रखते हैं?"
रमेश जी मुस्कुराकर कहते, "क्योंकि समय बहुत कीमती होता है, बेटा। और मैं कभी नहीं चाहता कि तुम्हारा समय बर्बाद हो।"
अनन्या पढ़ाई में बहुत तेज थी। उसने 12वीं में टॉप किया और मेडिकल कॉलेज में दाखिला पा लिया। लेकिन फीस बहुत ज़्यादा थी।
रमेश जी ने अपना रिक्शा बेच दिया, पड़ोसियों से उधार लिया और खुद अपनी ज़रूरतों को कम कर दिया, ताकि बेटी का सपना पूरा हो सके।
कॉलेज जाने के बाद अनन्या हर महीने फोन करती और पूछती, "पापा, आप ठीक से खाना खा लेते हैं ना?"
रमेश जी हमेशा एक ही जवाब देते, "हाँ बेटा, तू बस मन लगाकर पढ़ाई कर।"
समय बीता और अनन्या डॉक्टर बन गई। वह अपनी पहली सैलरी से पापा के लिए एक नया घर खरीदने का सपना देख रही थी।
लेकिन तभी उसे पता चला कि रमेश जी की दोनों किडनियाँ खराब हो चुकी हैं। डॉक्टरों ने कहा कि तुरंत किडनी ट्रांसप्लांट की ज़रूरत है।
अनन्या ने अपने सारे सपने और योजनाएँ एक तरफ रख दीं। वह पापा को अपने साथ घर ले आई और दिन-रात उनकी सेवा में लग गई।
डायलिसिस के लिए अस्पताल ले जाना, दवाइयाँ देना, रात भर जागकर उनकी देखभाल करना, यही उसकी दुनिया बन गई थी।
रमेश जी कमजोर होते जा रहे थे, लेकिन फिर भी मुस्कुराकर कहते, "बेटा, मेरी वजह से अपनी ज़िंदगी मत रोक।"
एक शाम उन्होंने अपनी पुरानी घड़ी अनन्या के हाथ में रखी और बोले,
"ये घड़ी अब तुम्हारी है। जब भी लगे कि समय रुक गया है, इसे देख लेना। मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा।"
तीन महीने बाद रमेश जी इस दुनिया को छोड़कर चले गए।
अनन्या उनके सीने पर सिर रखकर फूट-फूटकर रोई। पूरे मोहल्ले में सन्नाटा छा गया।
कुछ दिनों बाद जब उसने वह घड़ी खोली, तो उसके अंदर एक छोटा सा कागज़ मिला।
उस पर रमेश जी ने लिखा था:
"मेरी प्यारी अनन्या,
जब तुम ये पत्र पढ़ रही होगी, तब शायद मैं तुम्हारे पास न रहूँ।
मैंने तुम्हें जन्म नहीं दिया, लेकिन तुम्हें अपनी हर साँस से पाला है।
हर बारिश में तुम्हें छाता दिया और खुद भीगता रहा।
हर त्योहार पर तुम्हारे लिए नए कपड़े लाया, जबकि खुद पुरानी कमीज़ पहनता रहा।
मुझे सिर्फ एक बात का अफसोस है कि मैं तुम्हें माँ का प्यार नहीं दे सका।
लेकिन सच तो यह है कि तुम ही मेरी बेटी, मेरी माँ और मेरी पूरी दुनिया थीं।
अब रोना मत।
मेरे अधूरे सपनों को पूरा करना।
और हाँ... कभी-कभी इस घड़ी को कान से लगाकर सुनना।
शायद तुम्हें मेरी आवाज़ सुनाई दे—
'अनन्या... मेरी शेरनी...'"
पत्र पढ़ते ही अनन्या ने घड़ी को सीने से लगा लिया और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
आज अनन्या एक प्रसिद्ध डॉक्टर है। वह गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज करती है।
उसके क्लिनिक की दीवार पर आज भी पापा की वही पुरानी घड़ी टंगी हुई है।
हर सुबह उसे देखकर वह मुस्कुराकर कहती है,
"पापा, आज भी समय बहुत कीमती है... और मैं इसे कभी बर्बाद नहीं होने दूँगी।"
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