यह प्रश्न एक दिन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने महाबली हनुमान से पूछा था। कहते हैं कि इस घटना के पीछे एक ऐसी लीला छिपी थी जिसने पूरे द्वारका को यह सिखाया कि किसी भूखे और दुखी मनुष्य की पुकार को कभी अनसुना नहीं करना चाहिए।
द्वारका नगरी उस समय वैभव, समृद्धि और धर्म का केंद्र थी। चारों ओर सुख और संपन्नता दिखाई देती थी। ऊंचे-ऊंचे महल, विशाल बाजार और खुशहाल प्रजा देखकर हर कोई द्वारका की प्रशंसा करता था। उस राज्य की महारानी थीं माता रुक्मिणी, जो अपनी करुणा, दया और धर्मपरायणता के लिए प्रसिद्ध थीं।
एक दिन माता रुक्मिणी ने साधारण स्त्री का वेश धारण किया और अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए नगर भ्रमण पर निकल पड़ीं। वे बाजारों, गलियों और चौपालों में घूम-घूमकर लोगों की स्थिति देख रही थीं। उसी समय बाजार के एक कोने में एक अत्यंत गरीब भिखारी बैठा था। उसके कपड़े फटे हुए थे और उसकी आंखों में पीड़ा साफ दिखाई दे रही थी।
जैसे ही उसने माता रुक्मिणी को देखा, वह उनके पास दौड़कर आया और हाथ जोड़कर बोला, "माता, कृपा कीजिए। मेरी वृद्ध मां तीन दिनों से भूखी है। हमारे घर में एक दाना भी नहीं बचा। यदि संभव हो तो थोड़ा भोजन दिलवा दीजिए।"
उस समय रुक्मिणी किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए जल्दी में थीं। उन्होंने भिखारी की बात पूरी तरह सुने बिना ही आगे कदम बढ़ा दिए। भिखारी कुछ देर तक उन्हें देखता रहा। उसकी आंखों में निराशा भर गई। उसे लगा कि अब उसकी सहायता कोई नहीं करेगा।
वह वहीं बैठ गया और आकाश की ओर देखकर बोला, "हे प्रभु श्रीराम, अब आपकी ही शरण है। यदि इस संसार में कोई मेरी पुकार सुन सकता है तो वह केवल आप हैं।"
उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।
जैसे ही उसने श्रीराम का नाम लिया, अचानक वातावरण बदल गया। तेज हवा चलने लगी। आकाश में एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ। लोगों ने आश्चर्य से ऊपर देखा। कुछ ही क्षणों में उस प्रकाश से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए।
वे थे महाबली हनुमान।
उनके दर्शन होते ही वहां उपस्थित लोग स्तब्ध रह गए। हनुमान जी सीधे उस भिखारी के पास पहुंचे। उन्होंने अपने हाथों से उसे फल और भोजन प्रदान किया और प्रेम से कहा, "पुत्र, पहले अपनी माता को भोजन कराओ। भूखे माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म है।"
भिखारी की आंखों से कृतज्ञता के आंसू बहने लगे।
इसके बाद हनुमान जी ने रुक्मिणी की ओर देखा और गंभीर स्वर में कहा, "जिस राज्य में एक भूखा व्यक्ति सहायता के लिए पुकारता रहे और उसकी पुकार अनसुनी रह जाए, उस राज्य का वैभव किस काम का?"
हनुमान जी का यह वचन सुनकर वहां सन्नाटा छा गया।
रुक्मिणी को यह बात बहुत कठोर लगी। उन्हें लगा कि उनके सम्मान को ठेस पहुंची है। वे तुरंत महल लौटीं और भगवान श्रीकृष्ण को पूरी घटना बता दी।
उन्होंने कहा, "प्रभु, हनुमान जी ने सबके सामने मेरा अपमान किया है।"
भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते रहे। वे सब कुछ समझ रहे थे। अगले दिन वे स्वयं हनुमान जी के पास पहुंचे।
हनुमान जी ने श्रीकृष्ण को आते देखा तो तुरंत दंडवत प्रणाम किया।
श्रीकृष्ण ने प्रेमपूर्वक पूछा, "हे पवनपुत्र, क्या यह सत्य है कि तुमने द्वारका की महारानी को कठोर वचन कहे?"
हनुमान जी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "प्रभु, मैंने किसी का अपमान करने का विचार नहीं किया। मैंने केवल एक भूखे पुत्र और उसकी वृद्ध माता की पीड़ा देखी। उस समय जो सत्य मेरे हृदय में आया, वही मेरे मुख से निकल गया।"
श्रीकृष्ण कुछ क्षण मौन रहे।
उसी समय रुक्मिणी भी वहां पहुंच गईं। उन्होंने कहा, "यदि कोई राजमाता के सम्मान को ठेस पहुंचाए तो क्या उसे दंड नहीं मिलना चाहिए?"
वातावरण गंभीर हो गया।
तभी अचानक आकाश में दिव्य प्रकाश फैल गया। चारों दिशाओं में "ॐ नमः शिवाय" की ध्वनि गूंजने लगी। सभी ने ऊपर देखा।
एक दिव्य ज्योति के मध्य भगवान महादेव प्रकट हुए।
उन्हें देखकर श्रीकृष्ण, रुक्मिणी और हनुमान जी सभी ने श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया।
महादेव ने मुस्कुराते हुए रुक्मिणी से कहा, "हे देवी, भूखे और दुखी मनुष्य की पुकार ईश्वर तक सबसे पहले पहुंचती है। जब कोई सहायता मांग रहा हो, तब उसके दुख को सुनना भी धर्म का एक भाग है।"
फिर उन्होंने हनुमान जी की ओर देखा और कहा, "हे पवनपुत्र, सत्य बोलना सदैव श्रेष्ठ है। लेकिन ऐसा सत्य जो किसी के हृदय को अनावश्यक रूप से चोट पहुंचाए, उसे भी विवेक के साथ कहना चाहिए।"
दोनों ने विनम्रता से महादेव के वचनों को स्वीकार किया।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, "आज इस लीला का उद्देश्य किसी को दोषी ठहराना नहीं था। यह संसार को यह सिखाने के लिए था कि करुणा और विनम्रता दोनों ही आवश्यक हैं।"
रुक्मिणी की आंखों में पश्चाताप के आंसू आ गए। उन्होंने उस गरीब भिखारी और उसकी माता की सहायता करने का संकल्प लिया।
हनुमान जी ने भी हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु, मैं आगे से अपने वचनों में और अधिक मधुरता रखूंगा।"
महादेव प्रसन्न होकर मुस्कुराए।
कुछ ही क्षणों में आकाश दिव्य प्रकाश से भर गया। हनुमान जी ने जोर से उद्घोष किया—
"जय श्रीराम!"
भगवान श्रीकृष्ण ने भी मुस्कुराकर कहा—
"जय श्रीराम!"
और उसी क्षण सम्पूर्ण वातावरण भक्ति, प्रेम और करुणा से भर उठा।
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