वृंदावन के पास एक छोटा सा गाँव था, जहाँ एक बुजुर्ग महिला रहती थी। गाँव वाले उन्हें प्यार से 'भोली' कहते थे। जैसा नाम, वैसा स्वभाव—निश्छल, निर्मल और सादगी से भरा। भोली का अपना भरा-पूरा परिवार था, लेकिन उनका मन तो अपने नाती-पोतों और मंदिर वाले 'ठाकुर जी' में ही अटका रहता था।
जब भी कोई उनसे पूछता, "अरे भोली माई! रोज़ मंदिर जाती हो, क्या मिलता है वहाँ?"
तो वह बड़ी सहजता से मुस्कुराकर कहतीं, "अरे! वहाँ तो साक्षात् मेरे ठाकुर जी मिलते हैं।"
लोग उनकी सादगी पर ठहाके लगाते, उनका मज़ाक उड़ाते, पर भोली को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। उनके लिए भगवान कोई दूर रहने वाली शक्ति नहीं, बल्कि घर के किसी सदस्य की तरह थे।
एक बार मंदिर के पुजारी को दो दिनों के लिए किसी जरूरी काम से बाहर जाना पड़ा। उन्होंने सोचा, "मंदिर किसके भरोसे छोड़ूँ?" तभी उन्हें भोली का ख्याल आया।
पुजारी जी बोले, "माई! तुम तो रोज ठाकुर जी से मिलने आती ही हो। दो दिन के लिए मंदिर संभाल लो। इन्हें नहलाना, खिलाना और इनका ख्याल रखना।"
भोली तपाक से बोली, "ठीक है बाबा! जैसे बनेगा, खिला-पिला दूँगी। वैसे भी आप इन्हें बहुत लाड लड़ाते हो, इनसे कह देना अपना काम थोड़ा खुद भी कर लिया करें। दिन भर सजे-धजे बैठे रहते हैं!"
पुजारी जी उनकी बात सुनकर मन ही मन हंसे और मंदिर की चाबियाँ सौंपकर चले गए।
अगले दिन सुबह भोली ने बाल्टी भरकर पानी रखा और मंदिर के पट खोलकर हाथ कमर पर रख लिए। वह मूर्ति से ऐसे बोलीं जैसे अपने पोते से बोल रही हों—
"ऐ ठाकुर! सुन, जल्दी बाहर आ और चुपचाप नहा ले। अब मैं बुढ़ापे में तुझे उठा-उठाकर नहलाने से रही।"
और क्या चमत्कार हुआ! भोली के उस निस्वार्थ और अधिकार भरे स्वर को सुनकर भगवान की मूरत में हलचल हुई। साक्षात् नन्हे कन्हैया प्रकट हुए और हंसते-खेलते खुद ही स्नान करने लगे।
भोली ने पास में वस्त्र और चंदन रख दिया और बोली— "ले, अब खुद ही तैयार हो जा, मुझे रसोई भी बनानी है।"
ठाकुर जी ने मुस्कुराते हुए खुद को सजा लिया। भोली ने गरमा-गरम रोटियाँ बनाईं, थाली परोसी और कहा— "जल्दी खा ले रे लाला, फिर मुझे सफाई भी करनी है और थोड़ा सुस्ताना भी है।"
भगवान ने मजे से भोजन किया और फिर भोली के कहने पर सो भी गए। दो दिन तक यही सिलसिला चलता रहा। न कोई मंत्र, न कोई विशेष अनुष्ठान—बस एक माँ का आदेश और भगवान का प्रेम।
तीसरे दिन जब पुजारी जी वापस आए, तो उन्होंने भोली से पूछा, "माई! सेवा ठीक से हुई न? कोई कष्ट तो नहीं हुआ?"
भोली थककर बोली, "अरे बाबा! कष्ट तो कुछ नहीं, पर आपके ठाकुर जी बड़े नटखट हैं। मैंने तो बस खाना बनाया, बाकी अपना सारा काम इन्होंने खुद ही किया। मैं बूढ़ी भला इतना कैसे करती?"
पुजारी जी को लगा भोली मतिभ्रम का शिकार हो गई है। उन्होंने अविश्वास से कहा, "माई! एक दिन और रुक जाओ, मैं बहुत थक गया हूँ। आज भी तुम ही भोग लगाओ।"
पुजारी जी छुपकर पर्दे के पीछे से देखने लगे। भोली ने फिर उसी अधिकार से पुकारा— "आ जा रे ठाकुर! अब नखरे मत कर, जल्दी नहा ले।"
पुजारी जी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने देखा कि साक्षात् भगवान हाथ में जल लेकर खेल रहे हैं। जैसे ही पुजारी जी श्रद्धावश उनके चरणों में गिरने के लिए दौड़े, भगवान अंतर्ध्यान हो गए।
पुजारी जी रोते हुए भोली के पैरों में गिर पड़े और बोले— "माई! मैं उम्र भर पत्थर पूजता रहा, पर तुमने तो अपनी सरलता से भगवान को ही नीचे बुला लिया। मेरी भक्ति में अहंकार और विधि-विधान थे, पर तुम्हारी भक्ति में तो साक्षात् प्रेम था।"
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