कैलाश पर्वत पर उस दिन सब कुछ शांत था। हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच दिव्य प्रकाश फैला हुआ था। भगवान शिव माता पार्वती को वेदों और सृष्टि के सबसे गूढ़ रहस्यों का ज्ञान दे रहे थे। देवता भी जिस ज्ञान को प्राप्त करने की इच्छा रखते थे, वह स्वयं आदिशक्ति को प्रदान किया जा रहा था। वातावरण इतना पवित्र था कि मानो समय भी ठहर गया हो। लेकिन उसी क्षण एक छोटी सी घटना ने आने वाले समय की दिशा बदल दी।
जब भगवान शिव ज्ञान का उपदेश दे रहे थे, तभी माता पार्वती की दृष्टि दूर समुद्र की ओर चली गई। उन्होंने देखा कि लहरों के बीच छोटी-छोटी मछलियां खेल रही हैं। कुछ क्षणों के लिए उनका ध्यान ज्ञान से हटकर उस दृश्य में खो गया। भगवान शिव सब कुछ समझ गए। उन्होंने देखा कि जिस दिव्य ज्ञान को वे प्रदान कर रहे हैं, उस समय माता का मन कहीं और भटक गया है। महादेव के मुख पर गंभीरता छा गई। उन्होंने कहा, "देवी, जिस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए ऋषि-मुनि युगों तक तपस्या करते हैं, आज तुम्हारा मन उससे हटकर समुद्र की मछलियों में रम गया। तुम्हारा मन एक मछुआरण की भांति भटक रहा है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम पृथ्वी पर एक मछुआरण के रूप में जन्म लोगी।"
यह सुनते ही माता पार्वती स्तब्ध रह गईं। एक क्षण की भूल ने उन्हें अपने आराध्य से अलग कर दिया था। अगले ही पल श्राप प्रभावी हुआ और समय के साथ माता ने पृथ्वी पर दक्षिण भारत के एक मछुआरों के राज्य में जन्म लिया। वहां वह राजा की पुत्री के रूप में बड़ी होने लगीं। उनका नाम अलग था, उनका जीवन अलग था, लेकिन उनकी आत्मा के भीतर एक अजीब सी अधूरी पीड़ा हमेशा बनी रहती थी। उन्हें लगता था कि उनके जीवन में कुछ ऐसा है जो उनसे छिन गया है, कोई ऐसा है जिसे वह पहचान नहीं पा रही हैं, लेकिन जिसकी याद उनके हृदय में हर समय जीवित है।
उधर कैलाश पर भी स्थिति अलग नहीं थी। भगवान शिव बाहर से भले ही समाधि में लीन दिखाई देते थे, लेकिन उनके हृदय में शक्ति का वियोग था। संपूर्ण ब्रह्मांड जानता था कि शिव और शक्ति एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। माता पार्वती पृथ्वी पर थीं और महादेव कैलाश पर। यह दूरी केवल स्थान की नहीं, बल्कि एक श्राप की थी। देवता भी चिंतित थे। लेकिन सबसे अधिक दुखी थे नंदी महाराज।
नंदी केवल भगवान शिव के वाहन नहीं थे। वे उनके परम भक्त, परम सेवक और परम मित्र थे। उन्होंने अपने प्रभु के चेहरे पर छिपा हुआ दुख देख लिया था। वे जानते थे कि शिव और शक्ति का पुनर्मिलन होना ही चाहिए। लेकिन श्राप के कारण कोई सीधा मार्ग नहीं था। तब नंदी ने एक ऐसी लीला रचने का निश्चय किया जो इतिहास में अमर हो गई।
एक दिन नंदी ने अपना दिव्य स्वरूप त्यागकर समुद्र में एक विशाल और भयानक मछली का रूप धारण कर लिया। उनका आकार इतना विशाल था कि समुद्र की लहरें भी उनसे कांपने लगीं। वे मछुआरों की नावों को उलट देते, जाल फाड़ देते और पूरे क्षेत्र में भय फैलाने लगे। धीरे-धीरे समुद्र में जाना असंभव हो गया। मछुआरे भूखे रहने लगे। पूरा राज्य संकट में डूब गया।
राजा ने अपने श्रेष्ठ योद्धाओं को उस राक्षसी मछली को पकड़ने भेजा। एक के बाद एक वीर समुद्र में उतरे, लेकिन कोई भी उस विशाल मछली के सामने टिक नहीं पाया। कई नावें टूट गईं। कई योद्धा हारकर लौट आए। अंत में निराश होकर राजा ने पूरे राज्य में घोषणा करवा दी, "जो भी इस समुद्र के आतंक को समाप्त करेगा, मैं अपनी पुत्री का विवाह उसी वीर के साथ कर दूंगा।"
यह घोषणा दूर-दूर तक फैल गई। अनेक योद्धा आए, लेकिन सभी असफल रहे। उधर नंदी अपनी लीला को आगे बढ़ाते रहे क्योंकि वे जानते थे कि अभी उनके प्रभु को आना बाकी है।
कुछ समय बाद एक दिन राज्य में एक तेजस्वी युवक आया। उसके शरीर से अद्भुत आभा निकल रही थी। उसकी आंखों में गहराई थी और चेहरे पर अलौकिक शांति। वह साधारण मछुआरे के वस्त्र पहने हुए था। किसी को नहीं पता था कि वह वास्तव में कौन है। लेकिन वह कोई साधारण युवक नहीं था। वह स्वयं भगवान शिव थे जिन्होंने अपनी प्रिया शक्ति को वापस पाने के लिए नुलैयार अर्थात मछुआरे का रूप धारण किया था।
राजा ने उस युवक को देखकर कहा, "असंख्य योद्धा हार चुके हैं। क्या तुम भी उस दैत्याकार मछली का सामना करना चाहते हो?" युवक मुस्कुराया और शांत स्वर में बोला, "मुझे समुद्र तक जाने दीजिए।"
अगली सुबह पूरा राज्य समुद्र तट पर एकत्र हो गया। सभी की नजरें उस युवा मछुआरे पर थीं। वह धीरे-धीरे समुद्र के भीतर बढ़ा। समुद्र की लहरें भी मानो उसका स्वागत कर रही थीं। फिर उसने अपना जाल उठाया और पूरे विश्वास के साथ समुद्र में फेंक दिया।
उसी क्षण समुद्र में भयंकर हलचल मच गई। विशाल मछली प्रकट हुई। उसकी गर्जना से लहरें आकाश तक उठने लगीं। लेकिन जैसे ही उसकी दृष्टि उस युवक पर पड़ी, सब कुछ बदल गया। नंदी ने अपने प्रभु को पहचान लिया था। उनका हृदय भक्ति से भर उठा। वे जानते थे कि उनकी लीला का उद्देश्य पूरा हो चुका है।
नंदी ने कोई संघर्ष नहीं किया। उन्होंने स्वयं को शांत कर लिया और अपने प्रभु के जाल में समर्पित कर दिया। जो मछली पूरी दुनिया के लिए आतंक थी, वह अपने स्वामी के सामने एक विनम्र सेवक बन गई। लोगों ने आश्चर्य से देखा कि वर्षों का संकट कुछ ही क्षणों में समाप्त हो गया।
राजा अपने वचन से बंधा हुआ था। उसने अपनी पुत्री का हाथ उस वीर युवक को सौंप दिया। जैसे ही विवाह का समय आया, दिव्य चमत्कार घटित हुआ। श्राप समाप्त हो गया। मछुआरण के रूप में जन्मी राजकुमारी को अपने वास्तविक स्वरूप का स्मरण हो गया। वह स्वयं माता पार्वती थीं। और वह वीर युवक कोई और नहीं बल्कि स्वयं महादेव थे।
देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की। कैलाश और पृथ्वी दोनों आनंद से भर उठे। शिव और शक्ति का पुनर्मिलन हो चुका था। नंदी अपने प्रभु के चरणों में नतमस्तक हो गए। उनकी आंखों में आनंद के आंसू थे। उन्होंने अपने स्वामी के वियोग को समाप्त करने के लिए जो लीला रची थी, वह सफल हो गई थी।
तब भगवान शिव ने नंदी की ओर देखकर कहा, "नंदी, तुम्हारी भक्ति संसार के लिए आदर्श है। तुमने अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि अपने प्रभु के सुख के लिए यह सब किया। ऐसा सेवक और भक्त दुर्लभ होता है।"
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