मै टीटी का इंतज़ार करता रहा, जो सामान्यतः टिकट चेक करने आते हैं, लेकिन उस दिन देर तक नहीं आए। मैंने कोई शिकायत नहीं की, लेकिन उन्होंने खुद ही कहा—“आप आराम से बैठ जाइए।”
मेरे पास कोई विकल्प नहीं था, तो मैं बैठ गया। बातचीत शुरू हुई—उन्होंने पूछा मैं क्या करता हूँ, मैंने बताया कि बैंक ऑडिट में हूँ। उन्होंने खुद को बंगाली बताया और कांग्रेस से जुड़ी कोई पहचान भी साझा की।
गाड़ी चल पड़ी और हापुड़ आ गया मगर टीटी देर तक नहीं आया। रात के करीब 10 बज गए थे। मैं थका हुआ था, तो एक बार फिर निवेदन किया कि अगर संभव हो तो वह दूसरी सीट ले लें। उन्होंने कहा—“नहीं, इसी सीट पर एडजस्ट हो जाते हैं। मुझे तो लखनऊ तक जाना है।”
कई बार उन्होंने सहजता से कहा—“कोई बात नहीं, इसी सीट पर दोनों सो जाते हैं।”
सच कहूँ तो मुझे डर लगा। सामान भी कम था, तो मैंने वॉशरूम जाने का बहाना किया और अपना बैग उठाकर टीटी को ढूँढने चला गया। काफी देर बाद मुझे एक खाली सीट मिल गई और वहीं बैठकर शाहजहांपुर तक का सफ़र पूरा किया।
सीख
- कभी-कभी परिस्थितियाँ हमें असहज कर देती हैं।
- पहल चाहे किसी भी ओर से हो, हमें अपनी सुरक्षा और सहजता को प्राथमिकता देनी चाहिए।
- यह अनुभव मेरे लिए यादगार रहा—क्योंकि इसमें अनपेक्षित पहल और मेरी सावधानी दोनों शामिल थे।
डिस्क्लोज़र और अनुरोध
यह उत्तर व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है, न कि किसी सामान्यीकृत निष्कर्ष पर।
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