Crime : पति के जाने के 15 दिन बाद... जेठ जी ने बंद कमरे में मेरा हाथ पकड़ लिया, ओर राते रं#गीन करने को बोला!

 


पति के जाने के 15 दिन बाद... जेठ जी ने बंद कमरे में मेरा हाथ पकड़ लिया, ओर राते रं#गीन करने को बोला!**

पति की चिता की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी।

सिर्फ 15 दिन हुए थे अमित को इस दुनिया से गए हुए।

मैं 24 साल की कोमल, बदहवास सी कमरे के कोने में बैठी थी।

सोचा नहीं था कि जयपुर के इस छोटे से गांव में मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा तूफान आने वाला है।

तभी दरवाजे पर एक साया आकर रुका।

वह मेरे जेठ, राघव जी थे।

उन्होंने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया।

उनकी आंखों में हमदर्दी नहीं, बल्कि एक अजीब सी भूख थी।

"यदि इस घर में रहना है, तो मुझे खुश करना होगा..."

उन्होंने करीब आते हुए फुसफुसाकर कहा।

"तुम्हें अपनी रातें मेरे नाम करनी होंगी, कोमल।"

उनकी इस बात ने मेरी बची-कुची रूह को भी झकझोर कर रख दिया।

ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे जख्मी दिल को मुट्ठी में दबाकर भींच दिया हो।

मेरा पूरा शरीर डर के मारे कांपने लगा था।

"आप ये क्या कह रहे हैं जेठ जी? आप मेरे पिता समान हैं!"

मैंने रोते हुए, कांपती आवाज में उनसे कहा।

वह क्रूरता से हंसा और आगे बढ़ा।

"पिता? इस घर में अब तुम्हारी तकदीर का फैसला मैं करूँगा।"

उसने मेरा पल्लू पकड़ने की कोशिश की।

मैंने पूरी ताकत से उसे पीछे धकेला और दरवाजे की तरफ भागी।

लेकिन मुझे नहीं पता था कि असली घिनौना सच अभी सामने आना बाकी था…

मैं भागकर सीधे अपनी सास के कमरे में गई।

मुझे लगा कि एक औरत ही दूसरी औरत का दर्द समझ पाएगी।

"मा जी! देखिए जेठ जी ने मेरे साथ क्या करने की कोशिश की!"

मैंने रोते हुए सास के पैर पकड़ लिए।

सास ने धीमे से अपनी चाय का कप टेबल पर रखा।

उनकी आंखों में मेरे लिए कोई आंसू नहीं था, सिर्फ एक ठंडा सन्नाटा था।

"राघव जो कह रहा है, वही इस घर का नियम है कोमल," सास ने बेरुखी से कहा।

"अमित के जाने के बाद तुम इस घर पर बोझ हो। अगर छत चाहिए, तो राघव को खुश रखना होगा।"

मेरी पैरों तले जमीन खिसक गई।

जिस ससुराल को मैं अपना मानती थी, वह भेड़ियों का डेरा निकला।

मैंने समझ लिया था कि रोने और गिड़गिड़ाने से यह जंग नहीं जीती जा सकती।

मैंने अपने आंसू पोंछे और अपनी नजरें ऊपर उठाईं।

"ठीक है, मुझे दो दिन का वक्त चाहिए," मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा।

राघव के चेहरे पर एक कमीनी मुस्कान आ गई, उसे लगा वह जीत गया।

लेकिन वह यह नहीं जानता था कि एक शांत दिखने वाली नदी जब रूप बदलती है, तो तबाही लाती है।

मैंने अपने कमरे का दरवाजा बंद किया और अमित की अलमारी की तरफ बढ़ी।

अमित के कुछ पुराने कागजात ढूंढते वक्त मेरे हाथ एक डायरी लगी।

वह अमित की पर्सनल डायरी थी।

जैसे ही मैंने उसके पन्ने पलटे, मेरे होश उड़ गए।

डायरी में लिखा था: *“अगर मुझे कुछ हो जाए, तो समझ लेना यह कोई हादसा नहीं था। राघव भैया मेरी जान के पीछे…”*

अमित की डायरी का वह पन्ना पढ़ते ही मेरा खून खौल उठा।

अमित की मौत कोई एक्सीडेंट नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी।

राघव और सास ने मिलकर अमित को रास्ते से हटाया था ताकि वे उसकी बीमा राशि और जमीन हड़प सकें।

अब उनकी नजर मुझ पर और अमित के हिस्से की जायदाद पर थी।

अगली सुबह, राघव ने मुझे रसोई में अकेले पाकर फिर घेर लिया।

"क्या सोचा छोटी बहू? आज की रात मेरी होगी ना?" उसने गंदी नजरों से देखते हुए पूछा।

मैंने मुस्कुराकर उसकी तरफ देखा, जिसमें कोई डर नहीं था।

"ज़रूर जेठ जी, आज रात आप जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा।"

वह मेरी इस तब्दीली से हैरान था, लेकिन अपनी हवस में अंधा हो चुका था।

वह नहीं जानता था कि मौत का जाल अब उसके खुद के इर्द-गिर्द बुन चुका था।

रात के 11 बजे। पूरा घर सो चुका था।

राघव दबे पांव मेरे कमरे में दाखिल हुआ।

कमरे में मद्धम रोशनी थी। मैंने दो गिलास दूध टेबल पर रखे हुए थे।

"बैठिए जेठ जी, पहले दूध तो पी लीजिए," मैंने शांत आवाज में कहा।

राघव ने हंसते हुए गिलास उठाया और एक ही सांस में खाली कर दिया।

"अब ज्यादा इंतजार नहीं होता कोमल..." वह मेरी तरफ बढ़ा।

लेकिन दो कदम चलते ही उसके पैर लड़खड़ाने लगे।

उसका सिर चकराने लगा और वह फर्श पर गिर पड़ा।

"तुमने... तुमने इस दूध में क्या मिलाया है?" उसने गले को पकड़ते हुए तड़पकर पूछा।

"सिर्फ गहरी नींद की दवा, जेठ जी। क्योंकि आपकी असली खातिरदारी तो अब होगी," मैंने कहा।

तभी कमरे की लाइट जली।

और दरवाजे से पुलिस के साथ गांव के सरपंच अंदर दाखिल हुए।

राघव की आंखें फटी की फटी रह गईं।

सरपंच के हाथ में एक चालू मोबाइल था, जिसमें राघव की सारी कबूलियत रिकॉर्ड हो चुकी थी।

मैंने पुलिस को अमित की वह डायरी और राघव के खिलाफ सारे सबूत सौंप दिए।

चीखने-चिल्लाने की आवाज सुनकर सास भी दौड़ती हुई आई, लेकिन पुलिस ने दोनों के हाथों में हथकड़ियाँ पहना दीं।

ससुराल वाले जिसे बेसहारा और कमजोर समझ रहे थे, आज उसी ने पूरे साम्राज्य को ढहा दिया था।

गांव के लोग राघव और सास पर थूक रहे थे।

मैंने भारी मन से अमित की तस्वीर की तरफ देखा।

उनकी आंखों में एक अजीब सा सुकून तैर रहा था।

उस दिन मुझे समझ आया… अन्याय को सहना ही सबसे बड़ा अपराध है, जब औरत अपने आत्मसम्मान पर आती है तो वह दुर्गा बन जाती है।

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