उसने कहा था ‘बस दोस्त है’… और मैं मानता रहा


कमरे की सारी लाइट बंद थी…
बस नेहा के फोन की हल्की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।

मैं करवट बदलकर उसे देख रहा था।

वो मुस्कुरा रही थी।

ऐसी मुस्कान…
जो अब महीनों से मेरे लिए नहीं बची थी।

मैंने धीरे से पूछा — “अब तक जाग रही हो?”

वो थोड़ा चौंकी।

फिर जल्दी से फोन उल्टा करके बोली — “बस… reels देख रही थी।”

मैंने कुछ नहीं कहा।

लेकिन उस रात पहली बार
मुझे लगा —

हम एक ही बिस्तर पर हैं…
पर साथ नहीं हैं।

अगले कुछ दिनों में
मैंने छोटी-छोटी चीज़ें notice करनी शुरू कीं।

फोन हमेशा silent।

Bathroom में भी साथ।

मेरे सामने notifications off…

लेकिन अकेले में हल्की मुस्कान।

एक दिन मैंने casually पूछा — “किससे बात करती रहती हो?”

वो तुरंत बोली — “ऑफिस का काम है।”

मैंने सिर हिला दिया।

लेकिन दिल ने पहली बार झूठ पकड़ लिया था।

फिर एक नाम बार-बार सामने आने लगा—

“राहुल.”

कभी Instagram पर reaction…

कभी late-night message…

कभी अचानक online।

मैंने फिर पूछा— “राहुल कौन है?”

वो हँसकर बोली—

“अरे… बस colleague है। तुम भी ना… overthink करते हो।”

Overthink…

ये वही word था
जो हर झूठ के बाद इस्तेमाल होता है।

लेकिन सबसे ज्यादा दर्द cheating का नहीं था…

दर्द ये था कि
वो मुझे धीरे-धीरे replace कर रही थी।

अब वो पहले जैसी नहीं थी।

मैं कुछ बोलता — वो irritated हो जाती।

मैं पास बैठता — वो phone में busy।

मैं बाहर चलने को कहता — “थक गई हूँ…”

लेकिन उसी रात
वो किसी और के साथ हँस रही होती।

एक शाम मैं जल्दी घर आ गया।

दरवाज़ा खुला…

घर शांत था।

नेहा balcony में खड़ी थी।
फोन कान पर।

और वो मुस्कुरा रही थी।

वैसी मुस्कान…
जो कभी मुझे देखकर आती थी।

मैं धीरे से पीछे जाकर रुक गया।

फिर मैंने वो line सुनी…

“काश मैं तुमसे पहले मिली होती…”

उस एक line ने
अंदर कुछ तोड़ दिया।

नेहा पलटी…

और मुझे देखकर freeze हो गई।

कुछ सेकंड…
बस silence।

मैंने सिर्फ इतना पूछा—

“बस दोस्त?”

उसकी आँखों में guilt था…
लेकिन denial नहीं।

वो धीरे से बोली—

“मैंने चाहा नहीं था ये सब…”

मैं हँस पड़ा।

दर्द वाली हँसी।

“Cheating कभी अचानक नहीं होती नेहा…
धीरे-धीरे choices बनती हैं।”

वो रोने लगी।

“तुम बदल गए थे…” उसने कहा।

मैंने जवाब दिया — “और तुमने बताने के बजाय किसी और को चुन लिया।”

कमरे में इतनी खामोशी थी
कि दोनों की साँसें सुनाई दे रही थीं।

फिर उसने वो बात कही
जो शायद सबसे ज्यादा सच थी—

“राहुल मुझे समझता था…
लेकिन तुम्हारे जाने के डर से
मैं उसे भी कभी पूरी तरह अपना नहीं पाई।”

मैंने पहली बार उसकी आँखों में देखा।

वो मुझे खो चुकी थी…

और खुद भी कहीं बीच में अटक गई थी।

उस रात कोई चिल्लाना नहीं हुआ।

कोई dramatic scene नहीं।

बस दो लोग बैठे थे…

एक जिसने trust खो दिया था…
और एक जिसने खुद को।

 Ending:

कभी-कभी extra-marital affair प्यार से नहीं शुरू होता…

वो शुरू होता है
जब रिश्ता धीरे-धीरे
बात करना बंद कर देता है।

सवाल:

अगर प्यार कम हो जाए…
तो क्या किसी तीसरे इंसान का आना गलत है?

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