अभिषेक और पूजा की शादी को नौ साल हो चुके थे। दिल्ली के द्वारका में उनका छोटा-सा परिवार था। एक प्यारा बेटा, अच्छी नौकरी और एक ऐसा घर, जिसे देखकर कोई भी कह सकता था कि उनकी ज़िंदगी बिल्कुल खुशहाल है। बाहर से सब कुछ परफेक्ट दिखाई देता था, लेकिन कई बार सबसे बड़ी दरारें उन्हीं दीवारों के पीछे छिपी होती हैं, जो सबसे मजबूत दिखती हैं।
पिछले एक साल से अभिषेक को महसूस हो रहा था कि पूजा बदल रही है। पहले वह दिनभर की हर छोटी-बड़ी बात उससे साझा करती थी। अब उसका ज़्यादातर समय मोबाइल फोन में गुजरने लगा था। पहले सप्ताहांत परिवार के साथ बितते थे, लेकिन अब हर रविवार उसका एक ही जवाब होता था—"मेरी योगा क्लास है।" वह सुबह घर से निकलती और शाम तक लौटती। अभिषेक ने कभी कोई सवाल नहीं किया, क्योंकि रिश्ते की नींव विश्वास पर टिकी थी।
लेकिन एक रविवार सब कुछ बदल गया।
उस दिन पूजा जल्दी में थी और अपना फोन चार्जिंग पर छोड़ गई। तभी फोन पर एक व्हाट्सऐप नोटिफिकेशन आया—"आज मिलने का इंतज़ार नहीं हो रहा..."। अभिषेक का दिल जैसे एक पल के लिए थम गया। मैसेज जिस नाम से आया था, वह था "Ritu Yoga Group", लेकिन शब्दों में दोस्ती नहीं, कुछ और ही झलक रहा था।
उसने फोन हाथ में लिया, कुछ सेकंड तक स्क्रीन को देखा और फिर वापस रख दिया। उस दिन पहली बार उसे अपने ही घर में अजनबी जैसा महसूस हुआ।
जब पूजा शाम को लौटी तो सब कुछ पहले जैसा ही था। वही मुस्कान, वही सामान्य बातें, वही रोज़मर्रा की बातचीत। लेकिन अब अभिषेक हर शब्द के पीछे छिपे सच को पढ़ने की कोशिश कर रहा था।
अगले दो हफ्तों तक उसने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप सब देखता रहा। फोन पर नया लॉक, देर रात तक चलने वाली चैट्स, बिना वजह चेहरे पर आ जाने वाली मुस्कानें—ये सब उसके मन में सवालों का पहाड़ खड़ा कर रहे थे।
फिर एक रविवार उसने सच जानने का फैसला किया।
वह पूजा के पीछे-पीछे निकला। लेकिन पूजा योगा स्टूडियो नहीं गई। वह सीधे एक कैफे पहुँची। अभिषेक थोड़ी दूरी पर खड़ा सब देख रहा था। कुछ मिनट बाद एक आदमी वहाँ आया। पूजा उसे देखकर जिस तरह मुस्कुराई, उस मुस्कान को अभिषेक बहुत अच्छी तरह पहचानता था। कभी वही मुस्कान सिर्फ उसके लिए हुआ करती थी।
दोनों घंटों बातें करते रहे। अभिषेक दूर खड़ा यह सब देखता रहा। उसके अंदर जैसे कुछ टूट रहा था। उसे लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर भारी पत्थर रख दिया हो। फिर भी उसने कोई हंगामा नहीं किया। कोई सवाल नहीं पूछा। वह चुपचाप वापस घर लौट आया।
उस रात पूजा ने हमेशा की तरह पूछा, "तुम ठीक हो?"
अभिषेक ने उसकी आँखों में देखा और अपनी शादी के नौ वर्षों में पहली बार झूठ बोला—"हाँ, बिल्कुल ठीक हूँ।"
लेकिन वह ठीक नहीं था।
दो दिन बाद उसने पूजा से सीधा सवाल पूछा, "योगा क्लास कैसी चल रही है?"
पूजा मुस्कुरा दी। "अच्छी।"
तभी अभिषेक ने अपना फोन उसके सामने रख दिया। स्क्रीन पर वही कैफे की तस्वीर खुली हुई थी।
पूजा का चेहरा एकदम सफेद पड़ गया। कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया मानो समय रुक गया हो। कुछ देर बाद उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
"मैं सब समझा सकती हूँ..." उसने धीमी आवाज़ में कहा।
अभिषेक ने शांत स्वर में जवाब दिया, "झूठ को समझाने के लिए शब्दों की ज़रूरत पड़ती है... सच खुद ही सब कह देता है।"
पूजा रोती रही। फिर उसने वह बात कही जिसकी अभिषेक ने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
उसने कहा, "मैं उससे प्यार नहीं करती।"
अभिषेक ने दर्द भरी नज़रों से पूछा, "तो फिर क्यों?"
पूजा ने सिर झुका लिया।
"मुझे बस अच्छा लगता था कि कोई मुझे नोटिस करता था... कोई मुझे खास महसूस करवाता था।"
उस जवाब ने अभिषेक को और भी ज्यादा तोड़ दिया। क्योंकि कई बार रिश्ते किसी बड़े प्यार की वजह से नहीं टूटते। वे छोटी-छोटी अनदेखियों, अधूरेपन और उस ध्यान की तलाश में टूट जाते हैं, जिसकी कमी कोई महसूस कर रहा होता है।
उस रात दोनों एक ही कमरे में थे, लेकिन उनके बीच नौ साल की शादी नहीं, बल्कि एक ऐसा सच खड़ा था जिसे कोई भी आँसू मिटा नहीं सकते थे।
कभी-कभी बेवफाई प्यार से शुरू नहीं होती। वह सिर्फ उस एहसास से शुरू होती है कि कोई और हमें देख रहा है, समझ रहा है, महत्व दे रहा है। लेकिन जब सच सामने आता है, तब यह फर्क मायने नहीं रखता कि गलती प्यार की वजह से हुई या सिर्फ ध्यान पाने की चाहत में। टूटता हमेशा विश्वास ही है।
और जब विश्वास टूटता है, तो आवाज़ शायद बाहर नहीं सुनाई देती, लेकिन उसके टुकड़े दिल के भीतर बहुत देर तक चुभते रहते हैं।
अब सवाल सिर्फ इतना है—अगर कोई यह कहे कि उसने प्यार में नहीं, बल्कि सिर्फ ध्यान पाने की चाहत में गलती की है, तो क्या उस गलती का दर्द कम हो जाता है?

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