आठ साल हो चुके थे शादी को, लेकिन उसकी गोद अब तक सूनी थी। धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा। पहले ताने शुरू हुए, फिर बातें जहर बनने लगीं। हर छोटी बात पर उसे एहसास कराया जाता कि वह इस घर को वारिस नहीं दे सकी। पति का व्यवहार भी बदल चुका था। पहले खामोशी थी, फिर बेरुखी आई और आखिर में मारपीट तक बात पहुंच गई।
उसने हार नहीं मानी। डॉक्टर के पास गई, जांच करवाई। रिपोर्ट सामने आई तो सच्चाई कुछ और थी। कमी उसमें नहीं, उसके पति में थी। घरवालों को भी यह बात पता थी, लेकिन फिर भी हर बार दोष उसी पर लगाया गया। क्योंकि समाज में अक्सर सवाल औरत से पूछे जाते हैं, मर्द से नहीं।
पति शराब पीकर आता और सारा गुस्सा उसी पर निकालता। कई बार उसे मारा गया, अपमानित किया गया। वह टूट चुकी थी। कई बार मायके चली जाती, लेकिन हर बार मां यही कहकर वापस भेज देती — “लोग क्या कहेंगे?” वह फिर लौट जाती उसी घर में, जहां उसका सम्मान हर दिन थोड़ा-थोड़ा मर रहा था।
उसे हमेशा सुनाया गया कि “सहना औरत का गहना होता है।” लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आ गया कि कई बार सहना गहना नहीं, सजा बन जाता है। ऐसी सजा, जिसमें औरत गुनहगार भी नहीं होती।
फिर एक दिन उसने फैसला लिया। इस बार वह सिर्फ मायके नहीं आई, हमेशा के लिए लौट आई। उसने साफ कह दिया कि अब वह उस घर में वापस नहीं जाएगी। पहली बार उसकी मां ने भी उसका साथ दिया। शायद एक मां आखिर कब तक अपनी बेटी को जुल्म सहने भेजती।
ससुराल वालों ने धमकियां दीं, दबाव बनाया, समाज का डर दिखाया, लेकिन वह अपने फैसले पर अड़ी रही। आखिरकार तलाक हो गया। उसने बदले में कुछ नहीं मांगा। न पैसे, न सामान। बस अपनी आजादी लेकर निकल आई।
कुछ समय बाद उसकी जिंदगी में एक ऐसा इंसान आया जिसने उसे उसके अतीत से नहीं, उसके दिल से समझा। पहले वह डरी हुई थी, लेकिन मां के समझाने पर उसने दूसरी शादी कर ली। नया परिवार अच्छा था। वहां उसे ताने नहीं, सम्मान मिला। धीरे-धीरे उसने अपने पुराने जख्मों से बाहर निकलना शुरू किया।
आज वही महिला मां बनने वाली है। उसका आठवां महीना चल रहा है। कुछ ही दिनों में उसकी गोद भर जाएगी। दूसरी तरफ उसका पहला पति आज भी तिलमिला रहा है, क्योंकि अब समाज के सामने उसकी सच्चाई आ चुकी है।
यह सिर्फ एक महिला की कहानी नहीं, उन हजारों औरतों की कहानी है जिन्हें बिना गलती के ‘बांझ’ कह दिया जाता है। जिन पर समाज सवाल उठाता है, जबकि सच्चाई कहीं और होती है।
कई बार जिंदगी बदलने के लिए सिर्फ एक फैसला काफी होता है — खुद के लिए खड़े होने का फैसला।

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