हर सुबह 8:10 की लोकल ट्रेन और वो लड़की…
मैं हर सुबह काम पर जाने के लिए उसी स्टेशन से ट्रेन पकड़ता था।
पिछले 2 महीने से, मैंने एक लड़की को नोटिस करना शुरू किया।
वो हमेशा एक ही जगह खड़ी होती, हेडफोन लगाकर… किताब पढ़ते हुए।
ना ज्यादा मेकअप, ना दिखावा… बस सादगी में डूबी हुई एक खूबसूरत लड़की।
नाम नहीं पता था… पर दिल को उसका चेहरा याद था।
हर रोज़ उसे देखना मेरी दिन की सबसे खूबसूरत आदत बन चुकी थी।
मैं उसके पास खड़ा होने की कोशिश करता, कभी-कभी हिम्मत करके हल्की सी स्माइल भी दे देता… और वो जवाब में हल्के से सिर हिलाकर मुस्करा देती।
बस इतनी सी बात में कुछ तो था… जो दिल को सुकून देता था।
एक दिन वो ट्रेन नहीं आई… और मेरा दिन अधूरा रह गया।
वो दो दिन स्टेशन पर नहीं आई।
मुझे बेचैनी होने लगी… ऐसा लगने लगा कि कोई अपना खो गया हो।
तीसरे दिन जब वो लौटी, तो मैंने हिम्मत जुटाई…
“Hi… आप रोज़ यहां आती हैं… पर पिछले दो दिन नहीं आईं तो थोड़ा… मायूस सा लगा।”
वो मुस्कराई, और बोली:
“बस तबीयत ठीक नहीं थी…”
उस दिन हम साथ ही ट्रेन में बैठे।
उसने खुद कहा,
“मेरा नाम ‘समीरा’ है… और तुम्हारा?”
फिर हमारी रोज़ बात होने लगी…
कभी किताबों के बारे में, कभी बारिश के बारे में…
वो कहती थी — “मैं ज्यादा लोगों से बात नहीं करती, पर तुम्हें अच्छा लगता है सुनना।”
धीरे-धीरे वो मेरी सुबह की ट्रेन नहीं, मेरे दिल की ज़रूरत बन गई।
एक दिन बारिश हो रही थी… स्टेशन भीग चुका था…
समीरा भीगी हुई सी आई… बाल उलझे, आंखें थकी हुई।
मैंने कहा — “सब ठीक है?”
वो चुप रही।
ट्रेन आई, हम अंदर बैठे… और फिर उसने कुछ ऐसा कहा जो आज भी याद है…
“आर्यन… मुझे तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है।”
और फिर वो बोली…
“मैं शादीशुदा हूँ… 3 साल से।”
मैं जैसे सुन्न हो गया।
हर वो मुस्कान, हर वो बातचीत, हर वो सुकून… अचानक फिसलने लगा।
मैंने कुछ नहीं कहा।
वो बोली —
“मेरा रिश्ता अच्छा नहीं है… पति abusive है… मैं कुछ समय के लिए अपने मायके में हूँ। तुम्हारे साथ बात करके अच्छा लगता है, इसलिए रोज़ स्टेशन आती थी…”
मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या महसूस करूं…
मुझे उससे प्यार हो गया था — बिना ये जाने कि वो किसी और की है।
पर अब जब जान गया… तो खुद को गिल्ट भी होने लगा।
मैंने पूछा,
“फिर क्या हम अब बात नहीं कर सकते?”
वो बोली,
“बात कर सकते हैं… पर उम्मीद मत पालना। क्योंकि मैं खुद नहीं जानती मैं कहां खड़ी हूँ।”
अगली कुछ हफ्तों तक हम मिलते रहे…
मैंने कभी कोई सवाल नहीं किया।
ना शादी को लेकर, ना उसके भविष्य को लेकर।
बस साथ चलने की कोशिश करता रहा… क्योंकि वो खुश रहती थी मेरे साथ।
और फिर एक दिन वो स्टेशन पर नहीं आई…
उस दिन, उसके बाद… वो कभी नहीं लौटी।
मैंने उसे ढूंढ़ा… उसके नाम से सोशल मीडिया पर, स्टेशन पर, उसके जैसी लड़कियों में… पर वो नहीं मिली।
6 महीने बाद मुझे एक चिट्ठी मिली।
पता नहीं कैसे मेरे ऑफिस तक पहुंची।
लिफाफे में लिखा था —
“आर्यन,
तुम वो इंसान हो, जिससे मैं कभी मिलना नहीं चाहती थी… पर मिल गई।
तुमने बिना कुछ मांगे मुझे वो सुकून दिया जो मैंने सालों से नहीं पाया।
मैंने अपने रिश्ते को खत्म करने का फैसला लिया है…
और किसी दिन अगर ज़िंदगी ने फिर मौका दिया, तो शायद उसी स्टेशन पर फिर से मिलेंगे…
— समीरा”
और मैं आज भी उस स्टेशन पर रोज़ जाता हूँ…
किताब पढ़ता हूँ, हेडफोन लगाता हूँ, और हर बार प्लेटफॉर्म के उस कोने की ओर नज़र डालता हूँ…
शायद वो फिर से आ जाए…
इस बार बिना बोझ के, खुद की तरह, मेरे लिए।
सीख:
कभी-कभी कुछ रिश्ते अधूरे होकर भी ज़िंदगी को पूरी कर देते हैं।
प्यार हमेशा साथ रहने का नाम नहीं होता…
कभी-कभी बस किसी की थकी हुई रूह को थोड़ी सी राहत देना भी प्यार होता है।

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