12वीं का आख़िरी पेपर था।
सुबह स्कूल की इमारत कुछ और ही लग रही थी — जैसे वो भी जानती हो कि आज के बाद सब कुछ बदल जाएगा।
वो खिड़की जिससे रोज़ सूरज की रौशनी क्लास में आती थी, आज कुछ ज़्यादा सुनहरी लग रही थी…
जैसे वो भी हम सबको आख़िरी बार देख रही हो।
मैंने टेबल पर बैठते हुए निगाहें चारों तरफ़ दौड़ाईं।
कुछ चेहरे खुश थे, कुछ हल्के डरे हुए…
और फिर मेरी नज़र उसी पर पड़ी।
श्रेया।
सामने वाली लाइन में, वहीं दूसरी बेंच पर… वही शांत, वही सजी हुई, वही अनछुई सी।
मैं?
एक आम सा लड़का, जो अपनी फिजिक्स की कॉपी में प्यार ढूँढता था।
जो हर बार उसे देखकर कुछ कहने की हिम्मत बटोरता,
और फिर सोचता — “क्या फर्क पड़ेगा?”
वो?
सधे हुए शब्दों वाली लड़की।
हर नोटबुक उसकी हैंडराइटिंग से चमकती थी।
हर सवाल का जवाब, लेकिन हर जवाब में सादगी।
उसकी बातें कम होती थीं, लेकिन नज़रों में जैसे पूरी किताबें छिपी होतीं।
हमने 12वीं की पूरी क्लास एक साथ बिताई।
कभी बात नहीं हुई…
सिर्फ कुछ बार नज़रें मिलीं,
वो भी यूँ जैसे गलती से।
पर हर बार जब वो क्लास में आती,
तो मेरी नजरें खुद-ब-खुद उसकी कुर्सी तक खिंच जातीं।
शायद इसीलिए प्यार को “Feel” कहते हैं…
“Propose” नहीं।
📚 बोर्ड का पेपर शुरू हुआ।
मैंने सवालों की बजाय उसकी पीठ देखी।
उसका हेयर क्लिप ढीला था।
वो अपने बालों को बार-बार पीछे कर रही थी।
उसके दुपट्टे की किनारी बार-बार नीचे गिर रही थी — और वो बिना ध्यान दिए लिखे जा रही थी।
मैंने पेपर लिखना शुरू किया,
लेकिन दिल... कहीं और था।
तीन घंटे बीते, जैसे तीन मिनट।
पेपर खत्म हुआ।
बच्चे बाहर जाने लगे।
कोई कह रहा था, “अब कभी स्कूल नहीं आएँगे।”
कोई कह रहा था, “अब लाइफ शुरू होगी।”
पर मेरी लाइफ का सबसे खूबसूरत चैप्टर —
यहीं खत्म हो रहा था।
मैं बाहर खड़ा था…
शायद आख़िरी बार।
और फिर वो आई।
श्रेया।
धीरे-धीरे चलती हुई, हाथ में रोल नंबर की पर्ची, बाल बिखरे हुए…
पर चेहरे पर वही मासूमियत —
जैसे वो आज भी मेरी नज़रों से अंजान हो।
वो मेरे पास से गुज़री।
हमारी नज़रें मिलीं।
और इस बार... थोड़ी देर के लिए रुकीं।
उसने मुस्कराकर कहा —
“अब शायद कभी न मिलें…”
और मैं…
मैं बस देखता रहा।
कुछ कहना चाहा —
पर गले में जैसे आवाज़ अटक गई।
“अच्छा तो फिर… अलविदा?” — उसने पूछा।
मैंने बस सिर हिला दिया।
और वो चली गई।
उस पल को जितना रोका, उतना ही तेज़ वो दूर होती गई।
मैं वहीं खड़ा था,
उस पेड़ के पास, जहां दो साल पहले मैंने उसे पहली बार देखा था।
क्यों नहीं कह पाया?
क्यों नहीं कह सका कि वो मेरी हर सुबह का पहला ख्याल थी?
क्यों नहीं कह सका कि उसके पीछे बैठते हुए मैंने हर चैप्टर से ज़्यादा उसकी उंगलियों की हलचलें पढ़ी थीं?
क्यों नहीं कह सका कि वो सिर्फ मेरी क्लासमेट नहीं —
मेरे स्कूल की सबसे खूबसूरत याद थी?
शायद इसलिए…
क्योंकि कुछ रिश्तों की सबसे बड़ी खूबसूरती... उनकी खामोशी होती है।
आज...
मैं ऑफिस में बैठा हूँ, कॉफी पी रहा हूँ,
स्क्रीन पर मीटिंग का नोटिफिकेशन है —
पर दिल... आज भी 12वीं के उस आख़िरी दिन में फंसा हुआ है।
कभी-कभी एक notification आता है —
“People you may know”
मैं तुरंत देखता हूँ — शायद श्रेया हो।
पर नहीं।
उसका कोई Instagram नहीं है,
कोई लिंक्डइन नहीं,
ना कोई mutual friend।
वो मेरी लाइफ की वो कविता है जो कभी किताब में छपी ही नहीं,
पर हर रात मन के किसी कोने में दोहराई जाती है।
कहते हैं —
“हर किसी की लाइफ में एक अधूरी लकीर होती है —
जो पूरी हो सकती थी,
बस अगर वक़्त रुक जाता…
अगर आपकी लाइफ में कोई ऐसा चेहरा है,
जिसे देखकर आज भी दिल हल्का सा धड़कता है…
तो यार, कह देना।
शायद इस बार... कहानी पूरी हो जाए।

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