मृतक की तेरहवीं किसी की शादी की सालगिरह नहीं होती और न ही किसी का जन्मदिन मनाया जा रहा होता है जो कि हम इस दिन को भी मृतक के संबंधियों को मन पर भारी बोझ लेते हुए कुछ रस्मे पूरी करने के विषय को भी वाद विवाद में शामिल कर लें।
मृतक के संबंधियों ने अपने सारे दुख वाले भाव दरकिनार करते हुए भोज वाली रस्म पूरी की। सभी को सूचित करते हुए भोज में आने के लिए और खाने के लिए निमंत्रण भी दिया।
और अब आप वो भोजन अगले जन्म में कुता बन जाने के डर से खाना नहीं चाहते।
भाई साहब! खा लो खा लो। जहां से भी इज्जत सत्कार से मिले। जब कुते बनोगे तो तेरहवीं क्या और पंद्रहवीं क्या सब दूर से ही निवाला फैंकेंगे।
और एक बात मैं दावे से कह सकता हूँ कि इनसान के प्रति जितनी वफादारी यह श्वान रखते हैं अगर इनको इनसानों की जगह तेरहवीं पर भोजन करवा दिया जाए तो यह अगले जन्म में इनसान जरूर बन जायेंगे।
अगले जन्म में कुता बनने के डर से इस जन्म की हकीकतों से दूर मत भागो। भोज पर जाईये। बिना कोई नुकता चीनी के भोजन करिये। दो पल पीड़ितों के साथ बैठिये। फिर उनको भी पूरा जोर लगा कर पूरे मन से भोजन के लिए आमंत्रित करिये।
इस तरह एक मृतक के घर के जिंदा इनसान से इंसानियत का रिश्ता निभाईऐ।
होर की। हना जी। ठीक है न जी।

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