अगले 5 सालों में गर्मी तोड़ेगी अपने सभी रिकॉर्ड, दुनिया के तापमान में 1.5 डिग्री बढ़ोतरी की संभावना, रिसर्च में खुलासा


वैश्विक तापमान के अपनी सीमा को लांघने की आशंका दिन पर दिन बढ़ती जा रही है. यूके के मौसम विभाग (Weather Department) के शोधार्थियों की रिपोर्ट बताती है कि अगले 5 सालों में दुनिया के तापमान में 1.5 डिग्री से ज्यादा का इजाफा हो सकता है. इस बात की 50 फीसद आशंका है. माना जा रहा है कि यह बढ़ोतरी अस्थायी होगी, लेकिन तापमान जिस तरह से बढ़ रहा है उसने शोधार्थियों को चिंता में डाल दिया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि 2023 से 2026 के बीच एक साल ऐसा होगा जब गर्मी अपने सारे रिकॉर्ड तोड़ेगी. जिस तरह से गर्मी पैदा करने वाली गैसें पिछले तीन दशकों से बहुत तेजी से वातावरण में जमा हो रही है, इस वजह से वैश्विक तापमान वक्त से पहले और एक कदम आगे बढ़ कर अपने तेवर दिखा रहा है.

2015 में विश्व के औसत तापमान में पहली बार पूर्व औद्योगिक स्तर से 1 डिग्री सेल्सियस का इज़ाफा देखा गया था. इसे आमतौर पर 19वीं सदी के मध्य के तापमान के तौर पर दर्ज किया जाता है. यह वही साल है जब दुनियाभर के राजनेताओं ने पेरिस में पर्यावरण समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, और वैश्विक तापमान को 2 डिग्री से नीचे रखने की शपथ ली थी. साथ ही 1.5 डिग्री तक इसे बनाने के प्रयासों पर भी हामी भरी थी. फिर पिछले साल नंवबर में ग्लासगो में हुई COP26 में ही अपने 1.5 डिग्री सेल्सियस वाले वादे को दोहराया गया.

पिछले 7 सालों से वैश्विक तापमान 1 डिग्री पर कायम रहा है, 2016 और 2020 में इन सात सालों में सबसे ज्यादा गर्मी दर्ज की गई. इससे समझ आता है कि 1 डिग्री तापमान भी किस तरह से दुनिया को प्रभावित कर रहा है, पिछले साल उत्तर अमेरिका के जंगलो में लगी आग, और इस साल भारत, पाकिस्तान में में चलती तेज लपट इसका भयावता को दिखलाती है.

तापमान में बढ़ोतरी अस्थायी रहेगी

ऐसे में विश्व मौसम संगठन (WMO) के यूके कार्यालय ने कहा है अगले 5 सालों में तापमान के 1.5 डिग्री तक जाने की आशंका बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता है. लेकिन यह बढ़ोतरी अस्थायी रहेगी.

अध्ययन बताता है कि 2023 से 2026 के बीच में तापमान पूर्व औद्योगिक स्तर से 1.1 डिग्री सेल्सियस और 1.7 के बीच रहेगा. मौसम विज्ञानियों का अनुमान है कि इस अवधि में कोई एक साल ऐसा होगा जब तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस को पार कर सकता है और तापमान 48 डिग्री या 50 के करीब तक जा सकता है.

रिपोर्ट तैयार करने वाले प्रमुख मौसम अधिकारी डॉ लियोन हरमेन्सन का कहना है कि जो अहम बदलाव देखने को मिल रहा है वह कार्बर डाय ऑक्साइड की वातावरम में धीमी गति से हो रही बढ़ोतरी है.

ऊपर जाने के बाद नीचे नहीं आएगा तापमान
शोधार्थियों का कहना है कि ऐसा नहीं है कि अगर पांच सालों में तापमान 1.5 डिग्री से ऊपर जाता है तो वह फिर नीचे नहीं आएगा, तापमान दोबारा नीचे आ जाएगा. हालांकि जब तक हम ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन पर लगाम नहीं लगाते हैं तापमान में बढ़ोतरी को रोक पाना बेहद मुश्किल है. इसके अलावा हमारे समुद्र लगातार गर्म और एसिडिक यानी तेजाबी हो रहे हैं, ग्लेशियर पिघल रहे हैं जिससे समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी हो रही है और यह सभी बातें मिलकर चरम मौसम की स्थिति पैदा कर रही है.

अध्ययन से यह बात भी सामने आई है कि अगले पांच सालो में बढ़ते तापमान का असर सबसे ज्यादा आर्कटिक क्षेत्र में देखने को मिलेगा. शोधार्थियों का कहना है कि लंबी अवधि के औसत से तापमान में तीन गुना अंतर देखने को मिलेगा. यही नहीं इन पांच सालों में कोई एक साल ऐसा होगा जो 2016 और 2020 के रिकॉर्ड को भी तोड़ सकता है.

इसकी आशंका उस साल में ज्यादा है जो अलनीनो वर्ष होगा. यह एक प्राकृतिक मौसमी घटना है जो पूर्वी प्रशांत महासागर की सतही जल के असमान्य रूप से गर्म होने से जुड़ी हुई है, इसी के चलते दुनिया भर के मौसम पर असर पड़ता है.

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