15 साल की महमूदा बेगम असम के जूरिया हायर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ती है. 9वीं की स्टूडेंट महमूदा हर रोज हिजाब (Hijab) पहनकर स्कूल के गेट तक जाती है, लेकिन अंदर घुसने से पहले उसे उतारकर अपने बैग में रख लेती है. स्कूल खत्म होने पर बैग से हिजाब (Hijab) को निकालती है और पहनकर घर लौट आती है. 1948 में स्थापित जूरिया हायर सेकेंडरी स्कूल में महमूदा की तरह बाकी कई मुस्लिम लड़कियों का भी यही रूटीन है. वजह है, स्कूल के नियम. स्कूल के अंदर स्टूडेंट्स को निर्धारित यूनिफॉर्म के अलावा कुछ अलग ड्रेस पहनने की इजाजत नहीं है. चाहे वो मुस्लिम हों या हिंदू या किसी और धर्म को मानने वाले.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, महमूदा का कहना है कि अगर स्कूल में हिजाब पहनने की अनुमति दे दी जाए तो थोड़ी आसानी हो जाएगी, लेकिन वो ये भी कहती है कि नियम तो नियम हैं, टीचर्स ने कुछ सोचकर ही हिजाब और बाकी पारंपरिक पहनावे पर रोक लगाई होगी. असम के नागौन जिले में जूरिया में बंगाली मुसलमानों की अच्छी खासी तादाद है. यहां हिंदुओं की भी कई बस्तियां हैं. असम में स्थानीय और बाहरियों के बीच अरसे से चले आ रहे मतभेद के बीच लोगों को भी इन सामाजिक दूरियों के बारे में पता है, यही वजह है कि वो सामाजिक सद्भाव को कायम रखने के प्रति भी सतर्क रहते हैं.
15 साल की अशफियां सुल्तान भी महमूदा के साथ पढ़ती है. वो कहती है कि हिजाब हमारी पहचान का हिस्सा है. मैं घर में इसे पहनती हूं. परिवार में सभी महिलाएं ऐसा करती हैं. अगर हम लोग सड़क पर बिना हिजाब के निकल जाएं तो परिवार के लोग टोक देते हैं, लेकिन जब हम स्कूल जाते हैं तो वहां हमें ये पहनने की इजाजत नहीं है. कर्नाटक के हिजाब विवाद पर सुल्तान का कहना है कि मुझे इसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता है, लेकिन ये अच्छी बात है कि लड़कियों ने अपने मन की बात कही है.
करीब एक हजार स्टूडेंट्स वाले जूरिया हाई स्कूल के प्रिंसिपल रूपालिम सरमा ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि हम अपने स्कूल में ड्रेस कोड का सख्ती से पालन करवाते हैं. यह हिजाब, बुर्का पर भी लागू होता है और जींस या किसी और ड्रेस पर भी. हम स्कूल परिसर में इनकी इजाजत नहीं देते. लेकिन अगर कोई छात्रा स्कूली दुपट्टे से अपना सिर ढकती है तो हमें कोई आपत्ति नहीं. यही कारण है कि कर्नाटक जैसा कोई विवाद यहां नहीं हुआ. स्कूल में इंग्लिश पढ़ाने वाले राजेश बोरा कहते हैं कि बाहर उनके स्टूडेंट्स की अलग-अलग धार्मिक पहचान हो सकती है, लेकिन जब वो स्कूल में एंट्री करते हैं तो उसे बाहर छोड़कर आते हैं. यहां सबकी एक ही पहचान है.
9वीं की स्टूडेंट टोनू साहा भी इससे सहमत हैं. वो कहती है कि चाहे हिंदू हो या मुसलमान, सिख हो या ईसाई, स्कूल के अंदर सब बराबर हैं. जब हम में कोई फर्क नहीं है तो ड्रेस में क्यों अंतर होना चाहिए. 17 साल की नूरजहां स्कूली दुपट्टे से अपना सिर ढक कर रखती हैं. लेकिन जब स्कूल में सरस्वती पूजा जैसे समारोह का आयोजन होता है तो असम की पारंपरिक मेखला चादर ओढ़ती है. बाल खुले रखती है. वह कहती हैं कि किसी ने मुझे बालों को दुपट्टे से ढकने के लिए कभी नहीं कहा. अगर कोई कहेगा तो मैं टीचर्स के सामने अपनी बात रखूंगी, जैसा कर्नाटक में छात्राओं ने किया है.
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